निराला की समकालीनता: कुछ सूत्र-बिन्दु : विजय कुमार

By  विजय कुमार 

  •  दोस्तोवोस्की के लिए सुन्दरता एक चाहना है, इसीलिए वो त्रास है, और त्रास व सुन्दरता दोनों कभी एक दूसरे से अलग हो ही नहीं सकते.
  • सुकरात तो फ़कीर टाइप के आदमी थे सड़कों पर चलते हुए प्रवचन देते थे और फिर उन्हें जहर का प्याला दिया गया. प्लेटो ने उनके विचारो को लोगों के बीच प्रसारित करना उचित समझा. लेकिन, इसी क्रम हुआ यह कि प्लेटो कब अपने विचारों को सुकरात के नाम से कहने लगा पता ही नहीं चला. इसमें हुआ यह कि प्लेटो सुकरात के बहाने अपने समय के विचारों में सुकरात को देखने लगा.
  • १२ वीं-१३ वीं सदी के कवि थे ‘दांते’. उनके बारे में २० वीं सदी के एक आधुनिक कवि मोंताले ने, जो इटली के एक कवि थे, दांते भी इटली के थे, एक बहुत खुबसूरत बात कही है कि दांते में कुछ ऐसा है जो मेरा बहुत व्यक्तिगत है. और चूँकि मेरा बहुत व्यक्तिगत है इसलिए मैं उसके परे जाता हूँ और इस तरह दांते को ढूंढता हूँ. “Some thing is in myself which is relating to it to my own particular experience of Dante. It could amount more personal and therefore worthy and being reported and discussed here.”
  • एक निराला रामविलास शर्मा के हैं जो नवजागरण के अग्रदूत हैं, एक निराला दूधनाथ सिंह सिंह के हैं जो कि आत्महंता निराला हैं, एक तीसरा निराला रमेशचंद्र शाह के भी हैं जो प्रपत्तिभाव वाले निराला को वास्तविक निराला मानते हैं. और यहाँ तक कि हमारे युवा साथी प्रणय कृष्ण के भी निराला हैं, जो निराला को मार्क्सवाद की कसौटी पर कसते हैं और खरा नहीं पाते हैं. कुंवर नारायण जी के यहाँ भी चार तरह के निराला दीखते हैं- सामाजिक यथार्थ वाले निराला, गीतात्मक, राग और सौंदर्य के निराला, व्यंगकार निराला और अंत में अर्चना और आराधना वाले निराला. विजय कुमार इसमें ५ वाँ देशभक्ति और जागरण वाले निराला को जोड़ते हैं. एक व्यक्ति के अलग-अलग रूप दिखाई दे सकते हैं लेकिन एक सेंट्रल यूनिटी को निराला में तलाशना जरुरी है कि जो चार-पञ्च अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं इनकी वास्तविक केंद्रीय अन्विति क्या है?
  •  फ्रेडरिक जेम्सन कहता है कि पूंजीवाद एक ऐसी अवस्था में पहुँच गया है जिसमें तीन चीजों पर उसने कब्ज़ा कर लिया है और मनुष्य लगभग खदेड़ दिया है, मनुष्य को उसके मनुष्यत्व  से बेदखल कर दिया है. १. प्रकृति २.ग्रामीण संस्कृति ३. मनुष्य के अंतःकरण
  • २१ वीं सदी को परिभाषित करते हुए इटालियो केल्विनो ने जिन पांच चीजों पर जोर दिया है वह आज के सबसे बेसिक मुद्दे लगते हैं-  १. स्पीड(गति) २. लौजिकल(यथातथ्य होना) ३. डिजिटल (छाविकेंद्रित) ४. लाइटनेस(हल्कापन) ५. PREDICTABILITY (पुर्वानुमेयता)
  • जिस दौर में हमलोग जी रहे हैं, हमारी ज्यादातर कविताएं अस्तित्व के संकट की कवितायें हैं, व्यक्तित्व के प्रस्फुटन की कविता नहीं है. व्यक्तित्व से अस्तित्व के संकट तक की यह यात्रा पूरे पूंजीवाद की विकास-यात्रा है.
  • व्यक्तित्व क्या है? व्यक्तित्व बनता है आपकी प्रतिरोधात्मक शक्ति द्वारा, सब कुछ दाँव पर लगा देने के द्वारा, एक रैडिकल मूलभूत आकर्षण को लेकर चलने के द्वारा. निराला में इस व्यक्तित्व की की जो गहनता है इसको हम कितनी तरह से परिभाषित कर सकते हैं!.. निराला का जो एक रूप है ‘व्यक्तित्व’ इसी व्यक्तित्व को आज हमें फैलाने का अवसर नहीं मिल रहा है. हमें बहुत सीमित कर दिया जा रहा है.
  •   दोस्तोवोस्की ने जितना पाप का और पुण्य का संघर्ष देखा, जितना देवत्व और शैतानियत का संघर्ष अपने अपने उपन्यासों में रचा, दोस्तोवोस्की से ज्यादा तो संसार में कोई भी व्यक्ति मनुष्य के भीतर के सत और असत  के संघर्ष का लगभग पागल कर देने वाला इतना बड़ा ड्रामा खड़ा नहीं ही किया है और वही दोस्तोवस्की अंत में क्रिश्चिनिटी की तरफ जाते हैं. लेकिन, यह क्रिश्चिनिटी धार्मिक क्रिश्चिनिटी नहीं है . दोस्तोवोस्की की क्रिश्चिनिटी उस त्रास की है जिसमें वे अपने आप को समर्पित कर देते हैं.
  • सुसेन सेन्टेक कहती हैं कि Artist is a narrator and also is a commentator. कलाकार एक बखान करता है और बखान करते हुए वो एक चिन्तक भी है. ये दोनों चीजें एक साथ चलती हैं  सरोज स्मृति जैसी कविता में .
  • ‘छायावादी कविता मूलतः बिम्ब है.’ इक्कीसवीं सदी का जो समय है उसने तो अब बिम्बों को भी हमारे हाथों से छीन लिया है. मास मीडिया बिम्बों का प्रोडक्सन हाउस हो गया है. कवियों-कलाकरों के सामर्थ्य के बाहर चला गया है, बिम्ब रचना.
  •  समकालीन हिंदी कविता में जो जो नरेशन बढ़ा है, narratives की एक नई परंपरा आयी है उसका कारण क्या है ? इसका कारण है कि बिम्ब की सत्ता इतनी ज्यादा ताकतवर हो गयी है आपके सामने कि अब उस बिम्ब के सामने आपको फिर से narratives को लाना पड़ेगा.

विजय कुमार (जन्म १९४९) कवि आलोचक एवं सम्पादक हैं। कविता की संगत इनकी प्रमुख आलोचना पुस्तकें है। ‘अँधेरे में विचार’ नामक पुस्तक भी खासी चर्चित. सदी के अंत में कविता (उद्भावना कविता विशेषांक) इनकी संपादित पुस्तक है।

(उपर्युक्त बिन्दुओं को  हिंदी विभाग, बी.एच.यू. द्वारा ४ जनवरी २०१२ को ‘निराला की समकालीनता’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में दिए गए व्याख्यान से  साभार लिया गया है, भाषण के पूर्ण और मूल रूप के लिए परिचय-११ का अंक देखें.)

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