अकथ कहानी प्रेम की: संतो धोखा कासूं कहियो-2 : मार्तंड प्रगल्भ

(‘संतों धोखा कासूं कहियो’ के पहले भाग पर व्यापक प्रतिक्रियाएं हुईं. सहमती-असहमति दोनों स्वरों को सुना-पढ़ा गया. अधिकांश प्रतिक्रियाएं मौखिक रूप में ही आयीं. लेकिन, जो भी आयीं उनके माध्यम से लेख के कुछ-एक महत्वपूर्ण अभाव उभर कर सामने आये.  कबीर की कविता को पढने में या कवि कबीर को खोजने में पुरुषोत्तम अग्रवाल जी की पुस्तक कितनी मदद करती है, जैसे बिंदु अछूते रह गए थे. समीक्षा के बहाने इस लेख में मार्तंड ने कबीर के कविपक्ष और उस कविपक्ष के प्रति अग्रवाल जी के व्यवहार को खंगालने की कोशिश की है. अभी तक अग्रवाल जी की कोई भी टिपण्णी इस लेख के सन्दर्भ में सामने नहीं आयी है, समीक्षा-लेख की इस धारावाहिकता को समृद्ध करने में उनकी टिपण्णी एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी, ऐसी उम्मीद अभी शेष है!)

By  मार्तंड प्रगल्भ

एक आलोचक-विचारक के रूप में पुरुषोत्तम अग्रवाल हमेशा प्रभावित करते रहे हैं. और जैसा हर आलोचक-विचारक के साथ होता है, पुरुषोत्तम अग्रवाल की चिंतन धारा में भी अलग-अलग पड़ाव आये हैं. अलग-अलग काल खण्डों में जो कुछ वैचारिक दुनिया में घटता जाता है आलोचक-विचारक उससे संवाद भी करता जाता है. इस क्रम में कभी वह समकालीन चिंतन की आलोचना करता है ,कभी उसको एक हद तक स्वीकार करता है, कभी मुखामुखम से चिंतन की नयी दिशा पाता है, और कभी समकालीन विमर्शों के हाथों पराजित सा महसूस करते हुए अपनी चिन्ताधारा को उनके आगे नतमस्तक कर देता है. अग्रवाल जी की किताब ‘अकथ कहानी प्रेम की ..’ को अर्चना वर्मा ने ‘पुरुषोत्तम के प्रेम की अकथ कहानी’ के रूप में देखा है. मैं भी चाहता हूँ कि इस किताब को खुद पुरुषोत्तम जी के चिंतन की कहानी की तरह देखा जाए. हाँ फिलवक्त उस चिंतन के केंद्र में कबीर ही होंगे.

किताब बार-बार घोषणा करती है  कि वह पुरुषोत्तम जी के पिछले तीस वर्षों के अथक परिश्रम का फल है. और यह भी कि इस किताब में आई स्थापनाएं और अवधारणाएं बीज रूप में वही हैं  जो ‘विचार के अनंत’ में थीं. क्या सचमुच ऐसा है? पहले हम यह देखते हैं कि इस किताब में कबीर विषयक स्थापनाएं क्या हैं. फिर थोड़ी चर्चा ‘विचार के अनंत’ के बीज विचारों की होगी ,ताकि पुरुषोत्तम जी के दावों को जांचा-परखा जाए. इसके साथ ही साथ यह तो देखने का प्रयास चलता ही रहेगा कि उनके तीस वर्षों के इस अथक परिश्रम ने कबीर को हमारे सामने किस रूप में उपस्थित किया है और इस प्रकार उनकी ‘कवि कबीर की खोज’ ने कबीर की कविता के बारे में हमारे मूल चिंतन में कैसा परिवर्तन किया है. इसी चर्चा में हमें आलोचक-विचारक पुरुषोत्तम की चिंतन की दिशा और उनकी हताशा का भी साक्षात्कार शायद हो जाए!

पूरी किताब मोटे तौर पर दो भागों में है. पहला और बड़ा हिस्सा कबीर के वक्त को पहचानने के लिए इतिहास और समाज विज्ञान की मान्यताओं से जिरह का भ्रम पैदा करती है. और दूसरा हिस्सा कबीर की कविताई पर है. यह देखना मनोरंजक है कि पहले हिस्से की मान्यताओं का दूसरे हिस्से की व्याख्याओं से रिश्ता दूर-दूर का ही है. पर रिश्ता तो है. क्योंकि कबीर की कविता तक पहुँचने के लिए , उसको पूरा पाने के लिए समय के विस्तार को और उसकी कारस्तानियों को समझना तो होगा. और पुरुषोत्तम का दावा है कि इसे समझने में जो सबसे बड़ी रुकावट है, वह है औपनिवेशिक काल में रची गयी और अब बद्धमूल हो गयी हमारी दृष्टि. जिसे वह ‘औपनिवेशिक ज्ञान-कांड’ कहते हैं. उनका दावा है कि इस ‘ज्ञान-कांड’ से मुक्त हो के देखें तो साफ़ दीखता है कि कबीर वैष्णव थे! और उनकी काव्य संवेदना के मूल में बनियों की संवेदना है!

किताब में कहीं लिखा है कि कबीर अपने को “जाति-कुल निरपेक्ष वैष्णवता के सर्वाधिक निकट पाते हैं- ‘भगती नारदी मगन सरीरा| इहि विधि भव तरे कबीरा’, कारण यह कि वैरागी जात-पांत की परवाह नहीं करते थे- ‘इन मुन्डीयन मेरी जात गंवायी|’ (पृष्ठ-१६३) फिर कुछ पृष्ठों बाद लिखते हैं- “शाक्त-साधना कबीर की जिज्ञासा का आरंभ या एक पड़ाव ही हो सकती थी, परिणति नहीं| वहाँ से शुरू करके वे नाथों, सूफियों के रास्ते से भी गुजरे और आखिरकार जो पहचान  उनके साथ चली, जिसे उन्होंने खुद अपनाया, वह वैष्णव की ही थी”.(पृष्ठ-१८६) अर्थात कबीर वैष्णव ही थे. ये रामानंदी वैष्णव थे , स्मार्त नहीं. स्मार्त वैष्णव तो तुलसीदास थे. रामानंदी वैष्णव तो जाति-कुल निरपेक्ष थे. परन्तु अग्रवाल जी ने कहीं ये नहीं दिखाया है कि भक्ति के अलावा भी क्या रामानंदी वैष्णव जीवन के हर क्षेत्र में जाति व्यवस्था को नकार देते थे. जैसा कि नाथों के यहाँ था. कबीर के जिन पदों का हवाला अग्रवाल  देते हैं उनमें किसी भी पद में कबीर सीधे सीधे खुद को वैष्णव उसी तरह नहीं कहते जैसे खुद को जुलाहा कहते हैं. फिर वैष्णवों को भी धिक्कारते हुए कहते ही हैं कि ‘ वैष्णव भया तो क्या भया, बूझा नहीं विवेक’. पूरी किताब में उस विशेष परिस्थिति और सन्दर्भ की अनदेखी है जहां से कबीर नारद भक्ति और रामानंदी वैष्णवता दोनों की आलोचना करते हुए भक्ति और व्यक्ति दोनों की और इस प्रकार अपने आस-पास के व्यापक समाज की मूलगामी व्याख्या करते हैं. अग्रवाल जी ने नीची जातियों के बीच वैष्णवता की स्वीकार्यता के साक्ष्य के लिए विलियम क्रुक का उदाहरण दिया है. और इस जगह अग्रवाल कहीं ये सवाल  नहीं उठाते कि खुद क्रुक अग्रवाल के अनुसार बताई गयी रामानंदी वैष्णवता को कैसे समझ रहे थे. दरअसल यह भी एक विशेष चयन है. बाकी चिन्तक जो उपनिवेश काल में भक्ति और जाति पर विचार कर रहे थे वो तो खैर गैर ऐतिहासिक और ‘औपनिवेशिक- ज्ञानकाण्ड’ की तैयारी में थे, परन्तु क्रुक की बातें रोज़मर्रा की वास्तविकता को  देख रही थी. इसलिए “ ‘निम्न’ जातियों के वैष्णव पंथों की विशेषता विलियम क्रुक ने बिलकुल ठीक पहचानी थी- “ ब्राह्मणों के वर्चस्व और विशेषाधिकारों का विरोध करते हुए, सार्वजनिक उपासना के पवित्रतर और अधिक बौद्धिक रूपों की प्रतिष्ठा”. इस प्रकार कबीर के समय को और क्रुक के समय को लगभग एक मानते हुए अग्रवाल जी सामाजिक परिवर्तन की गैर ऐतिहासिक समझदारी तक पहुँच जाते हैं. अगर क्रुक की बात सही थी तो यह भी सही था कि कबीर और अन्य निर्गुनियों ने वर्णाश्रम  की जो मूलगामी आलोचना की थी वह सगुण भक्ति के प्रभाव और ब्राह्मण धर्म के १७वीं सदी के अंत और १८वीं सदी में होने वाले पुनरुत्थान के बाद भी अपनी विशेषताएं बहुत हद तक बचाए रखा था. अकारण  नहीं कि ऊपर से खुद को वैष्णव मानते हुए भी ये ‘निम्न जातियां’ ब्राह्मण धर्म  के बरक्स अपने को ज्यादा ‘प्रगतिशील’ बनाए रखीं थीं. वैसे यह भी जानने लायक है कि क्या सचमुच ये जातियां खुद को वैष्णव कहती थीं? या फिर क्रुक ने अपनी तरफ से इन्हें वैष्णव मान लिया था? क्रुक उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में नोर्थ वेस्ट प्रोविंस और अवध का सर्वेक्षण कर रहे थे. २०वीं सदी के पहले दशक के शुरुआत में ही ग्रियर्सन को किसी मिशनरी मि. डन ने चिट्ठी लिखा  था. मि. डन ने इलाहाबाद ,दिल्ली और गुडगाँव जिलों के अपने १९ साल के अनुभव के आधार पर तुलसी के बारे में ग्रियर्सन की बात की पुष्टि की, तथा लिखा की तुलसी के दोहे या चौपाइयों को सुनांने से प्रशासकों का काम कितना आसान हो जाता है क्योंकि लोग तब उनसे अपना जुड़ाव महसूस करते हैं. लेकिन उसने अपने पत्र में यह भी बताया था कि कबीर के दोहे भी उतने ही लोकप्रिय हैं. हिंदू ब्राह्मण और बनियों के बीच तुलसी ज्यादा स्वीकार्य थे जबकि The influence of Kabir is, I think fully important, in fact, Kabir touches races and castes who have little in common with Krishanism and who know little of राम दशरथ का बेटा, but much of राम जग का करता, as they phrase it (and pronounce it too.) Kabir is, if I mistake not the great Guru of kolis and chamars as well as many higher in the scale. (pp.462-63)(Appendix 1 , On The Influence Exercised by Tulasi Das in Western Hindostan .JRAS- 1903.) मि. डन को ये निम्न जातियां वैष्णव नहीं लगी थीं!

द्विवेदी जी के यहाँ कबीर ‘अवैष्णव नहीं थे’. अग्रवाल जी के यहाँ वह सीधे वैष्णव हो गए. सामाजिक और धार्मिक पहचानों की ऐसी व्याख्याएं कबीर के भीतर के उस ऐतिहासिक क्षण को अनदेखा करता है जहां श्रम में निहित विचारधारा, उधार ली गयी विचारधाराओं पर विजय पा लेती है. कबीर के भीतर का जुलाहा अपने श्रम की विचारधारा जब पहचान जाता है तो उसके लिए धर्म और वर्णाश्रम जैसे भेदपरक प्रवर्ग और शोषणपरक व्यवस्थाओं का सच भी सामने आ जाता है. कबीर के काव्य में जो निषेधपरक शब्दावलियों की इतनी भरमार है वह उनके चिंतन पद्धति की भी एक खास विशेषता है. और वह है सत्य को निषेध के निषेध के रूप में पहचानने और समझने की कोशिश. कबीर की सहज दृष्टि, उनके सहज तर्क और प्रत्यक्ष अनुभव को महत्व देने की घोषणा अर्थात उनके अनुभव सम्मत विवेकवाद ने ‘निषेध के निषेध’ को उनकी काव्य युक्ति में बदल लिया है. और जहां तक वैष्णव होने की बात है ,कबीर का यह पद हमें कुछ और ही बता रहा है-

माटिक कोट पषानक ताला, सोई बन सोई रखवाला|
सो बन देखत जीव डेराना, ब्राह्मण वैष्णव एकै जाना|
जौ रे किसान किसानी करई, उपजै खेत बीज नहिं परई |
छांड़ि देहु नर झेलिक झेला, बूडे दोऊ गुरु औ चेला|
तीसर बूडे पारधि भाई, जिन बन डाहो दावा लाई|
भूँकि भूँकि कूकुर मरि गयऊ, काज न एक सियार से भयऊ|
मूस बिलाय एक संग, कहु कैसे रहि जाय|
अचरज एक देखहु हो संतो, हस्ती सिंघाहि खाय||(रमैनी ६०,रामकिशोर शर्मा संपादित)

मिट्टी के किले पर पत्थर का ताला लगा है. चारो तरफ साधनाओं का जंगल है . इनको देख के जीव डरता है. साधनाओं के इस जंगल के अलग-अलग रखवाले हैं. और सब जड़ हैं पत्थर के ताले जैसे हैं. फिर वो ब्राह्मण हो या वैष्णव. ये खुद भी डूबेंगे और अपने चेलों को भी डुबायेंगे. ये अपना फायदा खोजने वाले सियार हैं जिनसे किसी काम के संभव होने की आशा करना भी मूर्खता है. कबीर किसी संशय में नहीं थे. उन्हें साफ़ पता था कि ऊपर-ऊपर की भिन्नता रखने वाले ब्राह्मण या वैष्णव, सब माया के जंजाल के वशीभूत हैं. इनके सहारे मुक्ति की आशा व्यर्थ है. इनकी साधना झूठी है. ऎसी स्थिति में कबीर के कुछ पदों में वैष्णवों के प्रति थोड़ी सहानुभूति देख कर अग्रवाल जी कबीर को भी वैष्णव घोषित कर देते हैं. और हमारी समझ से यह भूलवश नहीं है. इसके पीछे भी एक राजनीतिक दृष्टि है. और वह है गांधी के वैष्णवता को कबीर से जोड़ने की राजनीति. इस किताब में कम से कम तीन जगहों पर ‘देशज आधुनिकता’ और गांधी के दर्शन की साम्यता तो स्पष्ट की ही गयी है. लब्बो लुआब यह है कि ‘औपनिवेशिक ज्ञान कांड’ का सार्थक प्रतिउत्तर गाँधी के देशज आधुनिकता में है, और यह ‘देशज आधुनिकता’ कबीर की ही परम्परा में है. कबीर वैष्णव थे और ‘वैष्णव जन ते..’ गाने वाले गांधी सच्चे कबीर पंथी!

पुरुषोत्तम जी ने यह भी दिखाया है कि मध्यकाल में व्यापार के विकास ने बनियों को एक समृद्धि और रूतबा दिया. इस कारण बनियों के यहाँ मिलने वाला ‘फेयर प्ले’ का एथिक्स समाज में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है. और इस प्रकार वर्णाश्रम को चुनौती देते हुए जन्म-आधारित भेद भाव को चुनौती देता है. बनिया समाज दरअसल पुरुषोत्तम जी की ‘देशज आधुनिकता’ का अग्रदूत था. और इस प्रकार कबीर की ‘आधुनिक चेतना’, उनका वर्णाश्रम विरोध, समानता की घोषणा बनिया समाज के एथिक्स का ही काव्य संवेदन में रूपांतर था. और पुरुषोत्तम जी ने साबित करना चाहा है कि कंजूस बनियों का मिथक तो औपनिवेशिक काल की उपज है. वरना कबीर ने तो खुद अपने साईं को ही बनिया कहा था. बेवकूफ बनियों का मिथक झूठा है. पुरुषोत्तम जी दस्तकारों और ‘निम्न जातियों’ की संवेदना को कबीर में रूपांतरित होने पर चलताऊ ढंग से टिप्पणी करते चलते हैं जबकि बनियों कि संवेदना और कबीर पंथ में उनकी उपस्थिति पर विस्तार से और जब भी मौक़ा मिलता है चर्चा करते हैं. बालाघात का यह अंतर निम्न जातियों से आने वाले दस्तकारों के आत्मविश्वास और उस आत्मविश्वास में निहित क्रान्तिकारी चेतना से कबीर की काव्य-संवेदना को अलग करने की प्रक्रिया में है. अग्रवाल जी लिखते हैं- “व्यापारी और दस्तकार उस कवि से निश्चय ही अपनापा महसूस कर सकते थे, जो अपने राम को, साईं को कभी रंगरेज बना देता था, कभी ‘बाणियाँ’. जो कविता में भी अपनी कल्पना तरह-तरह की दस्तकारी के काम करने वाले कारीगर के रूप में भी करता था, और दूकानदार व्यापारी के रूप में भी. जो सार्थक जीवन बिताने के संतोष को उस दुकानदार की भाषा देता था, जिसने सौदा पूरा बेच लिया है, इसलिए जिसे हाट में दुबारा आने की ज़रूरत नहीं रही-“ पूरा किया बिसाहुणाँ,बहुरि न आवौं हट्ट.” और जो जीवन व्यर्थ गवां देने की चूक को भी वाणिज्य का अवसर गवां देने के रूपक में ही बांधता है- “कहे कबीर कछू बनिज न कीयौ, आयौ थौ इहि हाटि’ (ग्रंथावली, राग केदारी,१४) जो अपने मन को, लाभ के लोभ में मूल ही न गवां बैठाने की चेतावनी भी सावधान व्यापारी के लहजे में ही देता है-“मन बंजारा जागी न सोई| लाहे कारनि मूल न खोई” (ग्रंथावली,राग बिलाबल,६) “(पृष्ठ-१४४) कविता के रूपकों और प्रतीकों को अगर इस तरीके से पढ़ा जाए तो फिर निम्न पद का क्या मतलब निकलेगा –

मन बनियाँ बनिज न छोड़ै|
जनम जनम का मारा बनियाँ, अजहूँ पूर न तौले |
पासंग के अधिकारी लैले,    भूला    भूला    डोलै|
घर में दुविधा कुमति बनी है, पल पल में चित तोरै|
कुनबा वाके सकल हरामी,  अमृत  में  विष   घोलै|
तुमहीं जल में तुमहीं थल में , तुमही घट घट बोलै |
कहै कबीर या वा सिष को डरिये, हिरदे गाँठि न खोलै | (कबीर-वाणी, १५९)

क्या यहाँ ‘कबीर की संवेदना और व्यापारियों के बीच आत्मीयता पर रोशनी’ पड़ रही है? साई को बनिया बताने वाले कबीर, मन को भी बनिया बताते हैं. हमेशा डाँड़ मारने वाला बनिया. कभी पूरा न तौलने वाला बनिया. कुमति का मारा बनिया. अमृत में भी विष घोलने वाला बनिया. मिलावट का व्यापार करने वाला बनिया. ऐसे बनियों का तो पूरा कुनबा ही ‘हरामी’ है. इन ‘हिरदे गाँठि न खोलै’ बनियों से तो हमेशा डरना चाहिए. अब अगर पुरुषोत्तम जी के ही तर्क पर चलें तो बनियों के ‘फेयर-प्ले’ के एथिक्स का तो कबीर ने चिंदी-चिंदी कर डाला है इस पद में. और कंजूस बनियों के छवि निर्माता ‘औपनिवेशिक आधुनिकता’ से उसका यह महान योगदान छीन लेते हैं कबीर! कवि कबीर की खोज क्या ऐसे ही आधारहीन साक्ष्यों पर होगी! वास्तव में पुरुषोत्तम जी को बनियों के एथिक्स के सहारे कबीर की कविता के मूल में निहित उस क्रांतिकारी संवेदना से ध्यान हटाना था जिसे हम ‘अनुभवसम्मत विवेकवाद’ कहते हैं. और यह ‘अनुभवसम्मत विवेकवाद’ शास्त्रों के विवेकवाद को नकारने वाला और ‘आखिन देखि’, प्रत्यक्ष अनुभव को अभिव्यक्त करने वाला ‘निम्न जातियों’ से आये कामगारों के यहाँ ही संभव था. वर्णाश्रम की मूलगामी आलोचना और धर्म मात्र की मूलगामी आलोचना के पीछे भी इसी को मानना चाहिए. और हाँ कबीर की काव्य संवेदना को बनियों की संवेदना बताने के खतरनाक खेल से बाज आना चाहिए. और कबीर की कविता को अपनी मान्यताओं की पुष्टि के लिए इस्तेमाल करने की साजिश का विरोध करने वाले पुरुषोत्तम जी के खुद के वैचारिक पूर्वग्रह भी यहाँ स्पष्ट ही हैं. और कौन जाने जैसे जैनियों को बनियों ने संरक्षण दे कर उसकी क्रांतिकारी अंतर्वस्तु को खान पान तक की शुद्धता और अहिंसा तक सीमित किया कहीं वही हाल कबीर पंथों में बनियों की उपस्थिति ने तो पैदा नहीं किया! बहरहाल यह शोध का विषय है. इस ओर थोडा इशारा मोनिका हर्टस्मान ने भी किया ही था.(देखें संवेद, जुलाई २०१०. पृष्ठ-१९२-१९३)

आइये थोडा रुक कर बात कबीर की नारदी भक्ति पर भी करते चलते हैं. पुरुषोत्तम जी का कहना है कि कबीर खुद अपनी भक्ति को नारदी मानते हैं. ‘भक्ति नारदी मगन सरीरा’. जायसी कहते हैं कि कबीर नारदी भक्ति के इतने बड़े साधक थे कि इस साधना में खुद नारद भी उनसे पीछे छूट गए. ‘ना नारद तब रोइ पुकारा, एक जुलाहे सो मैं हारा’. यह बात पुरुषोत्तम जी को नामवर जी ने एक निजी बातचीत में कहा था. किताब के दूसरे संस्करण में इसका उल्लेख पुरुषोत्तम जी ने किया है. रुक कर सोचने वाली बात यह है कि जायसी ने कबीर को नारदीय भक्ति के आदर्श नारद से भी आगे जाने वाला क्यूँ कर कहा है. कबीर की भक्ति में वो कौन सी बात है जो उसे नारद सूत्र में निरुपित भक्ति से भी आगे ले जाती है. कबीर क्यूँ कर नारदीय भक्ति को ट्रांसैन्ड कर पाए. नारद भक्ति सूत्र उस प्रक्रिया की ओर इशारा करता है जो १०वीं सदी के अनन्तर समूचे यूरेशिया में घटित हो रहा था. इसे द्विवेदी जी शास्त्रों का लोक की तरफ झुकना कहते हैं. और शेल्डन पोलक देश्यभाषाकरण की व्यापक प्रक्रिया के सहारे व्याख्यायित करते हैं. जिस प्रकार संस्कृत- अपभ्रंश की सार्वत्रिक और अर्द्ध सार्वत्रिक संस्कृति को विस्थापित कर देशी भाषाओं में साहित्य रचना शुरू हुई उसी प्रकार धर्म साधनाओं के पुराने शास्त्रों को स्थानीय धर्ममतों ने चुनौती दी. इस प्रक्रिया में ही भक्ति संबंधी पुराने शास्त्रीय चिन्तनों को ज्यादा लोकोन्मुख और स्थानीय विशेषताओं से जोड़ने की कोशिशें भी हुई. यह एक दुहरी प्रक्रिया थी जहां लोक का शास्त्रीकरण भी ओ रहा था और शास्त्रों का लौकिकीकरण भी. उत्तर भारत में देश्यभाषाकरण की प्रक्रिया जैसे तुर्क सत्ता और उसके साथ आये इस्लाम और सूफी तत्वों के भिन्न सांस्कृतिक-राजनीतिक हस्तक्षेप से शुरू हुई उसी प्रकार भक्ति आदि के चिंतन के लौकिकीकरण पर भी इस भिन्न सांस्कृतिक हस्तक्षेप का प्रभाव पड़ा. मध्यकाल के वैष्णव भक्त विश्वनाथ ने कहा कि ‘प्रेम ही परम पुरुषार्थ है- प्रेमाः पुमर्थो महान्’. ऐसा पहले कभी नहीं कहा गया था. चार पुरुषार्थों के अतिरिक्त प्रेम न केवल पांचवां पुरुषार्थ माना गया वरन् इसे अन्य पुरुषार्थों से ज्यादा श्रेष्ठ भी कहा गया. भक्तों के लिए और सारे पुरुषार्थ कोई अर्थ नहीं रखते. क्या यह सूफियों का प्रभाव नहीं था. उसी तरह नारद भक्ति सूत्र में भी भक्ति को ‘परप्रेमरूपा’(२) ‘अमृतस्वरूप च’ (३) कहा गया. यहाँ अनिर्वचनीय को सीधे प्रेमस्वरुप ही माना गया.( अनिर्वचनीयं प्रेम्स्वरूपम् .५१.) प्रेम की ऎसी प्रतिष्ठा में सूफियों का प्रभाव था. चाहे पाकपत्तन के बाबा फरीद हों या लोरिक चन्दा की प्रेमकहानी गाने वाले मुल्ला दाउद. देशी भाषाओं में प्रेम को प्रतिष्ठित करने वाले ये सूफी ही उत्तरभारत की देशी भाषाओं के पहले पहल कवि थे. बहरहाल चाहे वो विश्वनाथ हों या नारद भक्ति सूत्रकार, भक्ति और प्रेम की यह जाति-कुल निरपेक्षता भक्ति के विशेष क्षेत्र में ही सीमित था. रोज़मर्रा की आम ज़िंदगी में वैष्णवों को शास्त्र-सम्मत आचरण करने होते थे. ऐसा नारद भक्ति सूत्रों से भी स्पष्ट है.  कबीर ने नारदीय भक्ति को ठीक वैसे ही स्वीकार नहीं किया. नारद भक्ति सूत्र में भक्ति के लिए जाति-कुल और कर्मकांड तथा लोक-वेद दोनों को अस्वीकार किया था, ऐसा उन सूत्रों को समग्रता में पढने पर सही नहीं लगता. भक्ति के क्षेत्र में समानता की चर्चा तो एक हद तक रामानुजम के यहाँ भी थी.फिर भक्ति के आदर्श उदाहरण के रूप में गोपियों की कृष्ण के प्रति प्रेम को बताया गया है. लेकिन ये प्रेम कैसा होगा और किस तरीके से होगा इसका उल्लेख नहीं किया गया है क्यूंकि यहाँ सूत्रकार सीधे भागवत में वर्णित गोपी-कृष्ण लीला को अप्रत्यक्ष रूप से संदर्भित मान रहा होता है. इसके अलावा निम्न सूत्रों को पढ़ने से हमें धर्म और वर्णाश्रम की कबीर द्वारा की गयी मूलगामी आलोचना और नारद भक्ति सूत्रों के अंतर का भी पता चलता है.

११.लोकवेदेषु तदानुकूलाचारणं तद्विरोधिषूदासीनता ||
१२.भवतु निश्चयदाढ्रयांदृध्व शास्त्ररक्षणम् ||
१३. अन्यथा पतित्यशंकया ||
१४. लोकोऽपि तावदेव भोजनादि व्यापारस्त्वाशरीरधारणावधि||
६१. न तदसिद्धौ लोकव्यवहारो हेयः किन्तु फलत्यागस्तत्साधनं च कार्यमेव||
६२. स्त्रीधननास्तिकचरित्रं न श्रवणीयम्|| (फिर भी स्त्री विरोधी दृष्टि के पीछे नाथपंथियों का प्रभाव बताते हैं अग्रवाल!,जबकि वर्णाश्रम की कठोर आलोचना करने वाले नाथों के बदले जाति-निरपेक्ष भक्ति के लिए नारदीय भक्ति सूत्र को ज़िम्मेदार मानते हैं! प्रेम के लिए भी नारदीय सूत्र, सूफियों का प्रभाव नहीं! यह उलटबांसी नहीं तो क्या है.)
७३. वादो नाव्लम्ब्यः ( कबीर खूब वाद करते हैं, और यह अग्रवाल जी के लिए नाथों का प्रभाव नहीं है!)
७६. भक्तिशास्त्राणि माननीयानि तादुद्धोधककर्माणि करणीयानि||

दस्तकारों और कामगारों के बढ़ते दबाव ने भक्ति के क्षेत्र में समानता को सामाजिक क्षेत्र में समानता के दावों में रूपांतरित किया. अकारण नहीं कि रामानंद के पहले निम्न जातियों के कामगारों की इतनी स्वीकृति नहीं थी. और कबीर ने इस दबाव को काव्य में रूपांतरित करते हुए धर्म और वर्णाश्रम की मूलगामी आलोचना की. यह अंतर इतना स्पष्ट है कि इसे किसी भी प्रकार से नारदीय भक्ति के पूर्ण स्वीकार में रिड्यूस नहीं किया जा सकता है. और न ही रामानंदी वैष्णवता की चादर में छुपाया जा सकता है. प्रेम अगर भक्ति है और केवल यही भक्ति है तो सहज प्रेम में रूकावट डालने वाले सारे मिथ्या जंजालों को भी खतम किया जाना ज़रूरी है. कबीर ने अपनी पिछली सारी परम्पराओं की आलोचना अपने सहज कामगार चित्त से की थी. और यही कारण है कि वो नाथों से लेकर नारद भक्ति और रामानंदी वैष्णवता सबको ट्रांसैंड कर जाते हैं. पुरुषोत्तम इसे बताना नहीं चाहते लेकिन प्रेम के अमर गायक जायसी इसे देख भी रहे थे और कह भी रहे थे. यहीं आकर वो उस जुलाहे से हार मान लेते हैं. कबीर के इस क्रिटिक का अग्रवाल के वैष्णव थीसिस में कोई जगह नहीं है. लेकिन कबीर पंथियों की सहज चेतना में यह लगातार रहता आया है. कई तरह के दबाव और अप्प्रोप्रियेशन के बाद भी. क्षितिमोहन सेन ने कबीर पंथी साधुओं से सुन कर जो पद इकट्ठे किये थे उनमें कबीर के नाम से यह पद भी शामिल था. कबीर यहाँ खुद नारद को संबोधित करते हैं-

नारद, प्यार सो अंतर नाहीं |
प्यार जागै तौही जागूं  प्यार सोवै तब सोऊँ ||
जो कोई मेरे प्यार दुखावै जड़ा-मूल सों खोऊँ||
जहां मेरा प्यार जस गावै तहां करौं मैं बासा||
प्यार चले आगे उठ धाऊँ मोहि प्यार की आसा||
बेहद्द तीरथ प्यार के चरननि कोट भक्त समाय||
कहैं  कबीर प्रेम  की महिमा प्यार देत बुझाय|| (२-१११, कबीर वाणी)

जो कोई भी मेरे प्यार को कष्ट देगा , उसके रास्ते में बाधा डालेगा, मुझसे दूर करने की कोशिश करेगा, दुनिया के जंजाल में फाँसेगा, अलग-अलग पंथों में भटकायेगा, ऊंच नीच का बाज़ार चलाएगा, बाह्याचार में उलझायेगा फिर चाहे वो ब्राह्मण हो या वैष्णव, शाक्त हो या वैरागी, योगी हो या अवधू , हिंदू हो या तुरक, काजी हो या पंडित, उसे मैं जड़-मूल से वंचित कर देता हूँ. नारद! प्रेम में अंतर नहीं होता, भेद नहीं होता. अर्थात नारद भक्ति में जो प्रेम का अंतर दिखाया गया है या उसका पालन किया जाता रहा है ,कबीर को वह स्वीकार नहीं. कबीर की मूलगामी आलोचना की यह प्रखरता कबीर पंथी साधुओं के चित्त से पूरी तरह धुल नहीं गयी थी. भले ही पुरुषोत्तम जी ‘औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड’ के सहारे यह मनवाने की कोशिश करते हों. भले ही पुरुषोत्तम गांधी को वैष्णव कबीर की परम्परा में शामिल करने का मिथ्या भ्रम फैलाते हों.

कबीर और नारद भक्ति के बीच के इस अंतर को समझने पर हमें यह भी समझ आने लगता है कि क्यों पुरुषोत्तम जी भक्ति के निर्गुण-सगुण विभाजन के बदले शास्त्रोक्त और काव्योक्त भक्ति के विभाजन को प्रस्तावित करते हैं. निर्गुण और सगुण भक्ति के साथ भक्ति के सामाजिक आधारों की स्पष्ट पहचान जुडी है. एक बार अगर यह पहचान इससे अलग कर दिया जाए तो कबीर आदि निर्गुनियों की प्रखर चेतना का महत्व भी धूमिल  हो जाएगा. पुरुषोत्तम जी कहते हैं कि नारद भक्ति सूत्र में प्रस्तावित भक्ति दरअसल शास्त्र से मुखामुखम करती कविता की स्वतंत्र संवेदना वाली भक्ति है. इसी भक्ति को रामानंद ने भी स्वीकार किया था. इसलिए यह गीता या भागवत में वर्णित भक्ति से अलहदा है. इस प्रकार नारद भक्ति सूत्र काव्योक्त भक्ति की प्रस्तावना रखता है. अगर केवल इसी मान्यता को ध्यान में रखें तब तो हिंदी के सारे भक्त कवि काव्योक्त भक्ति में समाहित हो जाएंगे. क्या सूर सिर्फ भागवत में वर्णित लीलाओं का अनुवाद कर रहे थे? या तुलसी ही ‘नानापुराण निगमागम सम्मत’ कहने मात्र से अपनी कविता में शास्त्रों का अनुवाद कर रहे थे? अगर वह अनुवाद मात्र होता तो कविता की लिहाज से कतई महत्वपूर्ण नहीं रह जाता. दरअसल जिसे काव्योक्त भक्ति कहा जा रहा है उस लिहाज से हिंदी के सारे भक्त कवि काव्योक्त भक्ति के अंतर्गत ही आ जायेंगे. इसलिए यह विभाजन निर्गुण भक्ति काव्य में निहित उस क्रांतिकारी चेतना की अवहेलना है जिसके दांत सगुण भक्ति ने उखाड़ दिए थे. पुरुषोत्तम जी का कहना है कि भक्ति काल में निर्गुण और सगुण का वैसा विभाजन नहीं था जैसा बाद में पंथों ने खडा किया था. तो क्या दार्शनिक स्तर पर सूर के भ्रमर गीतों की प्रखर निर्गुण आलोचना और सामाजिक स्तर पर  साखी,सबदी दोहरा गाने वाले निर्गुनियों को तुलसी की फटकार महज धोखा है? खुद पुरुषोत्तम जी १९९२ में जब ‘भक्ति संवेदना: शास्त्र और काव्य का मुखामुखम’ लिख रहे थे तो सर्जनात्मक शब्द के व्यापक पोलिटिक्स को शास्त्रों के बरक्स केंद्र में रखने की अपील कर रहे थे. उनके ध्यान में राम के नाम पर होने वाली हिंदू फासिस्ट राजनीति के समक्ष खुद सर्जनात्मक शब्द की राजनीति को रखने का आग्रह था. आग्रह था कि ‘हिंदू’ जाति की जो एक समस्याविहीन,आतंरिक संघर्षरहित राजनीतिक इकाई के रूप में जो राष्ट्रीय आख्यान  रचा गया था उसने साहित्यिक विरासत का मूल्यांकन करने के जो ‘नोर्म’ बनाए थे उसके सामने भक्ति काव्य की सर्जनात्मक चेतना को प्रतिष्ठित किया जाए. भक्तिकाव्य के ऊपर हिंदी-हिंदू का समीकरण लादने के बजाये, “हिंदू जातिपरक नार्म के समक्ष इसे नतमस्तक करने की बजाय यदि इसके अपने स्वरुप को परखा जाए तो स्पष्ट होगा कि इसमें समाज के आतंरिक उपनिवेशीकरण की तीखी आलोचना व्यक्त हुई है”( विचार का अनंत, पृष्ठ-१३०). इस प्रकार हिंदू फासीवादी राष्ट्रीय आख्यान के उत्तर में वह आतंरिक रूप से विभाजित हिंदू अस्मिता और उसके भीतर के उपनिवेशीकरण की तीखी आलोचना करने वाली निर्गुण काव्य संवेदना को सामने रखने की कोशिश कर रहे थे. और उनका आग्रह था कि ‘साहित्य की अन्याभिमुखता को श्रेयस्कर मानने वाली साहित्यिक दृष्टि का भद्रलोकीय आत्मछवियों से जो गहरा सम्बन्ध’ रहता आया है, वह भद्र लोक ‘उपनिवेशीकरण से अत्यंत क्षुब्ध है, लेकिन आतंरिक उपनिवेशीकरण से सर्वथा बेखबर’. आज जब खुद पुरुषोत्तम आतंरिक उपनिवेशीकरण को भूल कर उपनिवेशीकरण से ही केवल क्षुब्ध हैं. जब आतंरिक उपनिवेशीकरण के ब्राह्मणवाद रुपी विचारधारा को खुद ही उपनिवेशीकरण की उपज बता रहे हैं, तब कबीर आदि के सर्जनात्मक शब्द को, उनकी प्रखर ब्राह्मणवाद-विरोधी चेतना को, ‘देशज आधुनिकता’ जैसे मुल्लमे से छुपाने की कोशिशों को क्या कहा जाएगा! अगर वो सचमुच अन्याक्रांत न होकर समाज को आगाह करने और सर्जनात्मक सब्द को स्थापित करने का दावा कर रहे हैं तो फिर उन्हीं के शब्दों में कहना होगा कि “इस दायित्व को निभाने की उत्सुकता और साहित्य के स्वत्व की चिंता यदि सच्ची है तो फिर मुक्तिबोध के मुहावरे का सहारा लेकर यही कहा जा सकता है कि ‘पार्टनर पहले अपनी पॉलिटिक्स साफ़ कर लो” (वही, पृष्ठ- १३१)

कबीर की कविता धर्मसत्ता के बरक्स धर्मेतर अध्यात्म को प्रतिष्ठित करने वाली कविता है. अग्रवाल जी की यह स्थापना सचमुच विचारोत्तेजक है . लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पूरी बात-चीत में धर्म और धर्मेतर अध्यात्म दोनों ही एक पार-ऐतिहासिक(transhistorical) पद की तरह आये हैं. ठीक उसी तरह जैसे फायरबाख के यहाँ आये थे. मार्क्स की १८४४ की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियों में आये धर्म संबंधी चिंतन को उनके बाकी लेखन से काट कर पढ़ने पर ऐसे निष्कर्ष आते रहे हैं. वह भी तब जब पुरुषोत्तम जी के लिए श्रम के अलगाव से मुक्ति का ऐतिहासिक सन्दर्भ या मार्क्सवाद महज पश्चिमी प्रबोधन के बाध्यकारी आख्यान दिखते हों. बहरहाल ज्यादा विस्तार में न जाते हुए मैं उसी पाण्डुलिपि के सहारे अपनी बात रखने की कोशिश करता हूँ. पूरे विवाद के लिए अलग से किसी लेख की ज़रूरत है.

अग्रवाल जी ने बड़ी चालाकी से मार्क्स का सहारा लेकर श्रम और आध्यात्मिकता के अलगाव और उनके वस्तूकरण को दो अलग अलग घेरों के रूप में व्याख्यायित किया है. हांलाकि बाद में यह जोड़ना नहीं भूलते कि दोनों परस्पर सम्बंधित हैं. कैसे सम्बंधित हैं इस पर विचार नहीं है. और जहां मार्क्स ने विचार किया भी है उस हिस्से को अपने हिसाब से उपयोग में लाते हैं. मैं इस बात को दिखाने के लिए पहले अग्रवाल जी को उद्धृत करूँगा फिर मार्क्स को. मार्क्स को सीधे अंग्रेजी में उद्धृत करूँगा ताकि अनुवाद की दिक्कत से अर्थ सम्प्रेषण में दिक्कत न हो जाए. अग्रवाल लिखते हैं-

मनुष्य की आत्मसत्ता प्रकृति को ज्यों का त्यों अपना लेने की बजाय, उसके साथ आवयविक अस्तित्व में बने रहने की बजाय प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, प्रेम और संघर्ष के रूप में फलीभूत होती है. इस क्रम में सामजिक संगठन भी बनता है और मनुष्य की स्वतः स्फूर्त गतिविधियां –कल्पना और श्रम- उसके लिए परी हो जाती है; और तब : “मनुष्य की प्रजाति सत्ता (स्पेसीस बीइंग) भी उससे छीन  जाती है. उसकी प्रकृति और मनुष्य होने के नाते उसकी प्रजाति की विशिष्ट संपदा- आध्यात्मिकता- दोनों उससे छीन जाती हैं. दोनों(उसका स्वभाव न रहकर) उसके व्यक्तिगत अस्तित्व का साधन-मात्र रह जाती हैं. मनुष्य की देह पराई हो जाती है और ठीक उसी तरह पराई हो जाती है : उसकी बाहरी प्रकृति तथा उसकी अध्यात्म सत्ता- उसकी मनुष्य सत्ता.(पृष्ठ-३२४)

अब मैं मार्क्स को सीधे उद्धृत करता हूँ. ध्यान दे कि श्रम से अलगाव का रिश्ता आध्यात्मिक अलगाव से कैसे जुडता है और अग्रवाल कहाँ उसे अलग कर रहे होते हैं.

It is just in his work upon the objective world, therefore, that man really proves himself to be a species-being. This production is his active species life. Through this production, nature appears, as his work and his reality. The object of labour is, therefore, the objectification of man’s species-life: for he duplicates himself not only, as in consciousness, intellectually, but also actively, in reality, and therefore he sees himself in a world that he has created. In tearing away from man the object of his production, therefore, estranged labour tears from him his species life, his real objectivity as a member of the species, and transform his advantage over animals into the disadvantage that his inorganic body, nature, is taken away from him.
Similarly, in degrading spontaneous, free activity to a means, estranged labour makes man’s species-life a means to his physical existence.
The consciousness which man has of his species thus transformed by estrangement in such a way that species [-life] becomes for him a means.
Estranged labour turns thus:
(3)Man’s species-being, both nature and his spiritual species-property, into a being alien to him, into a means for his individual existence. It estranges from man his own body, as well as external nature and his spiritual aspect, his human aspect.”(EPM, pp. 74,progress publishers,1977.)

अपने श्रम के उत्पाद से, अपने जीवन के क्रिया-कलापों से, अपने प्रजाति सार से अलगाव का तत्काल परिणाम होता है मनुष्य का मनुष्य से अलगाव. जो सम्बन्ध किसी मनुष्य का अपने काम से होता है, अपने श्रम के उत्पाद से होता है वही सम्बन्ध उसका दूसरे मनुष्यों से भी होता है, दूसरे मनुष्यों के श्रम से होता है और उस श्रम की वस्तु से होता है.

Hence within the relationship of estranged labour each man views the other in accordance with the standard and the relationship in which he finds himself as a worker.(pp.75)

इस प्रकार श्रम के परायेपन की अभिव्यक्ति और उपस्थिति वास्तविक जीवन में कैसे होती है ? मार्क्स यह सवाल करते हैं. अगर श्रम का उत्पाद हमसे अलग है एलियन है तो आखिर है किसका? अगर हमारी अपनी क्रियाएँ हमारी नहीं है, किसी के द्वारा मजबूर की गयी हैं,  तो वह दूसरा कौन है. एक सत्ता (बीईंग) जो मैं नहीं है. कौन है वह सत्ता? मार्क्स कहते हैं वह सत्ता इश्वर है. जो अपने वास्तविक एजेन्ट पुरोहितों आदि से हमारे आत्म पर कब्जा जमाए बैठा रहता है. (pp.75-76) इतिहास के अलग-अलग काल खण्डों में यह इश्वर श्रम के दूसरे ठेकेदारों से समझौता करता चलता है. कबीर के समय केवल इश्वर की सत्ता थी. उस सत्ता के वास्तविक एजेंट अलग-अलग संप्रदायों के ठेकेदार थे. मनुष्य-से मनुष्य को बांटने वाला वर्णाश्रम था. ब्राह्मणवादी सत्ता तंत्र था. अपने श्रम के अलगाव को समझने और मुक्त होने के क्रम में ही इस पूरी व्यवस्था का मूलभूत नकार कबीर के यहाँ संभव हुआ. इसी ने उनके प्रजाति-सत्ता को मुक्त किया. इसी कारण उनकी कविता ,उनकी कला में आध्यात्मिक अलगाव से भी मुक्ति है. कबीर सम्पूर्ण श्रम को मुक्त नहीं कर पाए. खुद के अभिज्ञान को ज़रूर उन्होंने कला में रूपांतरित किया. या रूपांतरित करने की कोशिश की. उनका अध्यात्म और प्रेम इसी मौलिक अभिज्ञान के कारण इतना सहज और विशिष्ट लगता है. अग्रवाल इस सच्चाई को समझ नहीं पाए. फिलवक्त इस अलगाव के पीछे काम करने वाला पूंजीवाद धर्मसत्ता के साथ नए राजनीतिक सम्बन्ध में है. नए सम्बन्ध बनाता जा रहा है. कबीर के समय वैश्विक दृष्टि का भ्रम केवल धर्म की भाषा में व्यक्त होता था. इसलिए उसकी आलोचना भी उसी भाषा में थी. आज वह धर्म और पूंजी के संश्लिष्ट रिश्तों में है. पूंजी से मुक्ति के लिए श्रम संघर्षरत है. इसलिए इस आध्यात्मिक अलगाव से मुक्ति की भाषा और संवेदना पूंजीवादी राजनीतिक से लड़कर ही हो सकती है. श्रम के अलगाव को दूर करने वाली राजनीति की भाषा में ही हो सकती है. अग्रवाल या तो इसे समझते नहीं हैं या समझना नहीं चाहते.

कबीर की कविताई पर अग्रवाल जी ने सहृदयता से विचार किया है. लेकिन पूरे किताब की स्थापनाओं का उसमे कोई योगदान नहीं है. मृत्यु और प्रेम संसार की सभी श्रेष्ठ कविताओं के विषय रहे आये हैं. भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक पलों में इनका भिन्न-भिन्न तरीकों से कवियों ने अपनी काव्य अनुभूतियों में अनुवाद किया है. शब्द की महत्ता कविता पहचानती है. और वह जीवन के ज्यादा नजदीक भी होती है. इसलिए वह केवल दर्शन नहीं है. दर्शन से ज्यादा जीवन है. कबीर की कविता के पास हमें आज भी जाना होता है और आगे भी जाना होगा. पता नहीं अग्रवाल जी की स्थापनाएं कुछ दिनों बाद खुद कबीर की कविता के सामने बेबस नज़र आने लगें!

  मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत  हैं.

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2 thoughts on “अकथ कहानी प्रेम की: संतो धोखा कासूं कहियो-2 : मार्तंड प्रगल्भ

  1. यह अपनी तार्किकता से प्रभावित करता है .पढता ही जाऊं ,का अहसास बना रहा .इस हिस्से से असहमत नहीं हुआ जा सकता है

  2. दोनों भाग पढ़े. कहना चाहूँगा कि इस किताब पर पहली बढ़िया प्रबुद्ध समीक्षा पढ़ने को मिली. इस समीक्षा के लिए मैं आपका निजी रूप से भी कोटिशः आभारी हूँ.

    मेरे सबसे प्रिय मित्र, जो कबीर और मार्क्सवाद पर विशेषज्ञ थे, इस किताब एक बड़ी जालसाजी के रूप में देखते थे. उन्होंने कई ऐसे बिंदुओं की चर्चा की थी जिसे आपने लेख के पहले भाग में उठाया है. उस मित्र कि लिखने-पढ़ने से सम्बंधित शायद यह आखिरी ही इच्छा थी….क्यूंकि उसके बाद से वो मानसिक रूप से बहुत अस्वस्थ चल रहे हैं… फ़िलहाल पिछले एक साल से घर से गायब हैं…

    (साखी के नए अंक में उनका जिक्र हुआ है, चाहे तो आप देख सकते हैं)

    इस किताब पर जितनी सामग्री मिली मैंने पढ़ी लेकिन कोई मुझे उन बिंदुओं पर बात करता नहीं दिखा जिसे मेरे मित्र उठाना चाहते थे. इसलिए इस किताब की समस्यायों पर लिखने की तीव्र इच्छा थी लेकिन कबीर पर पर्याप्त अधिकार न होने के कारण नहीं लिख पा रहा था. और मुश्किल ये कि उसकी तैयारी भी नहीं कर पा रहा था. आज आपकी समीक्षा पढ़कर एक आत्मीय संतोष मिला कि हिन्दी में अभी भी सिर्फ आडम्बरों, प्रशस्तियों एवं समीक्षाओं के सहारे कोई किताब नहीं टिक सकती. बहुत-बहुत साधुवाद….

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