अभिव्यकि की स्वतंत्रता और सभ्यता की राजनीति वाया गणपति बाईपास

(मई-दिवस और गणपति-विवाद से सम्बंधित मीरा के लेख ने बहुत सारे लोगों को उस दिन की घटना के साथ-साथ हमारे राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवहार को भी revisit करने को वाध्य किया, साथ ही साथ एक बड़े कैनवस की बहस को भी आमंत्रित किया. लोगों ने फेसबुक, ब्लोग्स और पर्चों में इस लेख के हवाले से राजनीतिक व्यवहार में सिविक सेन्स के अभाव से लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की प्रकृति जैसे विषयों पर चर्चाएं की.  सहमती और असहमती दोनों स्वरों को देखा जा सकता था.. फिर इन सभी प्रतिक्रियाओं के आलोक में मीरा की एक  दूसरी टिपण्णी भी आयी..संदीप सिंह का यह लेख इस बहस की एक और कड़ी को सामने लाता है.)

By संदीप सिंह

एक मई को लाल बैंड के जेएनयू कार्यक्रम में गायिका त्रिथा को ‘गणपति गायन’ से रोके जाने की घटना ने एक महत्वपूर्ण बहस को आगे बढ़ाया है. इस बहस ने अभिव्यक्ति की आजादी, सेंसरशिप, इतिहास, संस्कृति व धर्म के बारे में आमतौर पर रहने वाली (‘बनी-बनाई’) ‘उदार’ (कई बार सरल इसलिए बचकानी भी) समझ के सम्मुख कुछ गौरतलब सवाल खड़े किये हैं.

                क्या त्रिथा को गणपति गायन से ‘रोका जाना’ उचित था? क्या यह ‘रोका जाना’ ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सामूहिक हत्या’ थी? क्या यह ‘श्रोताओं’ की ‘अकल्पनीय असहनशीलता’ थी? इस ‘रोके जाने’ की जरूरत/चाहत, क्या वैचारिक स्तर पर एबीवीपी जैसे संगठन की सोच से मिलती समझ की पैदाइश थी, फर्क सिर्फ डिग्री का था? क्या यह ‘रोका जाना’ इतिहास के लेखन, पुनर्लेखन, प्रतीकों की व्याख्या-पुनर्व्याख्या के प्रति उदासीन रहते हुए ‘लोकप्रिय’ और ‘पोलिटीकली करेक्ट’ बने रहने का एक उदाहरण था? क्या यह ‘रोका जाना’ धार्मिक/सांस्कृतिक/ऐतिहासिक, प्रतीकों/छवियों/व्यक्तित्वों (उदा. के लिए गणेश) की उत्पत्ति के ऐतिहासिक स्रोतों के प्रति लापरवाह/अनभिज्ञ रहने के चलते पैदा हुआ था? क्या यह ‘रोका जाना’ अपने आप में विचार और कार्यवाही के स्तर पर एक तरह की सेंसरशिप का नमूना नहीं था? क्या ऐतिहासिक प्रक्रिया में वर्चस्वशाली शक्तियों द्वारा रचा-पचा ली गयीं तमाम छवियाँ/प्रतीक हमसे ज्यादा सावधानी, धैर्य, खुलेपन और गंभीर दृष्टि की मांग नहीं करते? कला/साहित्य/धर्म/इतिहास इत्यादि विमर्शों/अनुशासनों में अनगिनत किस्म के और कई बार विरोधी विचारों/व्याख्याओं की उपस्थिति से संवाद/जिरह/बहस करने की हमारी पद्धति/औजार क्या होंगे? भविष्य में दुबारा ऐसी कोई स्थिति पैदा होने पर हम क्या कदम उठाएंगे? आदि कई सवाल हैं जो हमसे निश्चय ही हमारी (अक्सर) बनी-बनाई मान्यताओं पर गंभीर चिंतन की मांग करते हैं.

             कई साथियों की यह चिंता/प्रतिवाद गौरतलब है कि बिना बात/बहस आनन्-फानन तरीके से बीच में गायन को ‘रोका जाना’ येनकेनप्रकारेण असंगत/बेमेल (विरोधी) विचारों/प्रतीकों/छवियों के प्रति हमारे ‘असहिष्णु’ और गैर ऐतिहासिक रवैये को दिखाता है. कुछ साथियों का मानना है कि अपनी अंतर्वस्तु में यह ‘रोका जाना’ कहीं न कहीं अपनी सुविधा/असुविधा (पढ़िए पोलिटिकली करेक्ट होना) अनुसार सेंसरशिप थोपने और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के हनन का परिचायक है.

            शुरू में यह साफ़ कर देना उचित होगा कि संभवतः ‘गणपति गायन’ की समाप्ति पर आयोजकों द्वारा उक्त गायन से अपनी असहमति/आपत्ति जाहिर करते हुए कलाकार से भी संदर्भित मंच/कार्यक्रम और उसके उद्देश्यों के प्रति सचेत/संवेदनशील रहने की जिम्मेदारी को चिन्हित कराते हुए अपना विरोध दर्ज किया जा सकता था. संभवतः असहमति जाहिर करने का यह एक ज्यादा लोकतांत्रिक, कारगर व स्वस्थ तरीका होता.

            लेकिन क्या यह (तथाकथित) ‘रोका जाना’ सच में आयोजकों (श्रोताओं के बड़े नहीं भी तो एक हिस्से) को आरएसएस व एबीवीपी के समकक्ष खड़ा कर देता है, यहाँ अब फर्क सिर्फ क्वांटिटी का है क्वालिटी का नहीं? क्या इसके बाद हम नैतिक/वैचारिक स्तर पर सेंसरशिप की मुखालफत करने का अधिकार खो देते हैं या कमजोर कर देते हैं?

           एक सवाल उठा कि “आपके के लिए किसी अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर पर, आप द्वारा सचेतन बनाये गये मंच पर आकर कोई अनपेक्षित ढंग से ऐसी बातें/विचार कहता/गाता है जिन पर हमारी आपत्ति, विरोध/मतभिन्नता है तो हमारा रवैया/व्यवहार कैसा होगा’? क्या हम उसे बोलने नहीं देंगे? चुप करा देना ही क्या आपत्ति दर्ज करने का एकमात्र तरीका है? बहस, तर्क, व्यंग, विडम्बना और वाद-विवाद का क्या हुआ”? इस बिंदु पर थोडा ठहरकर सोचने की जरूरत है.

           क्या इस सवाल को उठाने की गुंजाईश है कि वह कौन सी ‘अभिव्यक्ति’ है जिससे हम स्वस्थ बहस करेंगे और कौन सी ‘अभिव्यक्ति’ है जिससे सीधी मुठभेड़ करेंगे? क्या हम सारी ‘अभिव्यक्तियों’ से स्वस्थ बहस करेंगे या मुठभेड़ करेंगे? क्या स्वस्थ बहस और मुठभेड़ इतने ही दो विरोधी पद हैं?  क्या यह कहे जाने की छूट है कि दरअसल हर किसी के लिए ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ के सैधांतिक आधार पर खड़े होकर हम ‘समय-काल-परिस्थिति’ के अनुसार भिन्न-भिन्न सन्दर्भों में पैदा हुई “अभिव्यक्तियों” से भिन्न-भिन्न तरीकों से मुखामुखम,हस्तक्षेप/व्याख्या करेंगे? क्या यह कहे जाने की गुंजाईश है कि भिन्न-भिन्न ‘अभिव्यक्तियों’ से वाद-विवाद/संवाद/संघर्ष में जाने के हमारे कोण अलग-अलग होंगे? क्या ‘अभिव्यक्ति’ अपने आप में कोई परम चीज है? या हम सारी ‘अभिव्यक्तियों’ को एक कटेगरी मानकर, एक ही तरीके का व्यवहार प्रस्तावित कर रहे हैं? क्या किसी ‘अभिव्यक्ति’ के बरक्स हमारा रवैया ‘अभिव्यक्ति’ की अंतर्वस्तु और रूप से तय होगा या इसके लिए हमारे पास बना-बनाया कोई निर्धारित निर्विवाद फ्रेमवर्क है?

त्रिथा इलेक्ट्रिक के सदस्य मई दिवस कार्यक्रम में/ चित्र: प्रकाश के रे

           यहाँ पर विनम्रतापूर्वक यह दुबारा कहे जाने की जरूरत है कि इन सवालों से त्रिथा के गायन को रोके जाने को प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करने की कोशिश समझ बैठने की भूल कतई न की जाए. तुलनाएं अक्सर सरल समाधान प्रस्ताव करती हैं लेकिन कई बार यह बहुत खतरनाक हो जाता है. ‘अभिव्यक्तियों’ की अंतर्वस्तु और रूप के स्तर पर न जाने कितनी किस्में हैं जाहिर है कि सवाल उठता है, हम उनसे कैसे ‘डील’ करें?

             आपत्ति, विरोध, असहमति दर्ज करने की वह कौन सी लक्ष्मण-रेखा है जिसे पार करते ही आप ‘असहिष्णु’ होकर अभिव्यक्ति की ‘सामूहिक हत्या’ करने लगते हैं? क्या यह रेखा आपत्ति/विरोध की शारीरिकता(physicality) में है? क्या ‘दर्शकों’ द्वारा हूटिंग कर कलाकार को अपना ‘परफार्मेंस’ बंद करवा देने को ‘कलाभिव्यक्ति की सामूहिक हत्या’ नहीं कहा जाएगा? क्या कार्यक्रम के दायरे से बाहर जा रही या उस ओर बढ़ रही प्रस्तुति और कलाकार को सचेत करना या उसे उस प्रस्तुति को खत्म करने को कहना ‘अविश्वसनीय असहिष्णुता’ है? ऐसा प्रतीत होता है कि दर्शकों द्वारा शोर मचाकर या दूसरी प्रस्तुति (इस प्रसंग में लाल बैंड) की मांगकर सम्बंधित कलाकार को हटने के लिए कहना ठीक है लेकिन किसी पदाधिकारी या व्यक्ति द्वारा इसी बात को जाकर कहना अनुचित! और यह वैलेंटाइन का विरोध करने वालों से बस एक कदम पीछे है! आखिर ऐसा क्यों है? कहा गया कि “यदि श्रोताओं द्वारा अस्वीकार (किस माध्यम से? चिल्लाकर, ताली बजाकर या खड़े होकर या बैठे-बैठे शोर मचाकर?) कर दिए जाने पर गायिका स्वयं हट जातीं तो यह एक बात हो सकती थी. लेकिन जिस क्षण कोई, नेता या भीड़, स्टेज पर आकर प्रस्तुति को खत्म करवाता है, सेंसरशिप थोपने की एक कार्यवाही है”. क्या एक बार फिर से यह पूछना नाजायज होगा कि क्यों ऐसा माना जा रहा है कि ‘अभिव्यक्ति’ विशेष के बरक्स आपत्ति का एक रूप सहनीय है तो दूसरा रूप असहनीय! श्रोता अपनी जगह पर बैठे-बैठे हल्ला मचाकर कलाकार को मंच छोड़ने के लिए मजबूर कर दें तो वह ठीक लेकिन श्रोताओं की उसी राय/आपत्ति को कोई पदाधिकारी मंच पर जाकर व्यक्त कर दे तो बेठीक! इस बात को भी यहाँ नोट करा देना होगा कि एक पदाधिकारी और एक आम छात्र के बीच (उदारवादी नजरिये से देंखे )सत्ता का अलग टैग आमतौर से लगा रहता है, लेकिन जेएनयू के सन्दर्भ में यह सच है कि यहाँ के छात्र शक्ति संतुलन में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं, खैर. हालांकि सिद्धांततः दोनों तरह की कार्यवाहियां एक तरह की सेंसरशिप का उदहारण हैं. मुझे लगता है कि यहाँ पर हम कहीं न कहीं ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ को संदर्भित और सापेक्षिक रूप से देख पा रहे हैं. न ही ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ परम है न ‘विरोध करने की आजादी परम है.

            कोई भी कलाकार रचता/गाता/लिखता क्यों है? सम्प्रेषण के लिए. क्या सम्प्रेषण की चाहत की यह रचनात्मक भूख उसे अपने लक्षित श्रोता/भोक्ता समुदाय की भावनात्मक और वैचारिक/ऐतिहासिक  बनावट-बुनावट, पसंद-नापसंद (रचनात्मक) से निरपेक्ष रख सकती है? ‘अभिव्यक्ति’ और उसको कहने की आज़ादी को अगर प्रभावी और संप्रेषणीय होना है तो उसे स्थान, घटना, सन्दर्भ, समय, औचित्य और रूचि के साथ संगति में आना पड़ेगा. तभी वह कला और कलाकार अपने होने को ज्यादा सही तरीके से स्थापित कर पायेगा. बावजूद इसके, इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि अंततः बाकी आजादियों की तरह ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ भी उन परिस्थितियों की सीमाओं/शर्तों से पूरी तरह कभी मुक्त नहीं हो सकती, जिन परिस्थितियों में वह पैदा हुई है, अगर लक्ष्य सम्प्रेषण है तो! यह परिस्थितियां जेएनयू में मई दिवस के कार्यक्रम की हो सकती हैं और (थोडा व्यंगात्मक होने की छूट हो तो) आधुनिक बाज़ार में प्रकाशक और प्रकाशनों की भी!

            यह एकदम सच है कि भले ही एक मई की घटना के बहाने से यह बहस हो रही है लेकिन इससे उठे सवाल अपने आप में गंभीर निहितार्थ लिए हुए हैं. और नागरिक समाज में एक छात्र, बुद्धिजीवी और नागरिक के बतौर हमसे हमारे अधिकारों, जिम्मेदारियों और दायित्वों के प्रति ज्यादा गंभीर होने की मांग करते हैं.

          वाम-जनवादी ताकतों को अधिकतम संभव सीमा तक ‘अभिव्यक्ति के अधिकार’ की रक्षा में खड़ा होना चाहिए. चाहे वह खुद के अधिकार की बात हो या विरोधी के अधिकार की. जैसा वाल्तेयर कहते हैं (ठीक-ठीक याद नहीं) कि ‘हो सकता है कि मैं आपसे पूरी तरह असहमत हूँ, पर आपकी अभिव्यक्ति की रक्षा मैं अपनी जान देकर भी करूँगा’. नवजागरण की इस उक्ति के तुरंत बाद हमें यह कथन भी याद कर लेना चाहिए कि ‘आपकी स्वतंत्रता वहाँ आकर खत्म हो जाती है, जहाँ से मेरी नाक शुरू होती है’.

           अब यहाँ पर यह साफ़ कर देना ठीक रहेगा कि ‘चुप’ करा देने की ‘राजनीति’ (और स्पष्ट कहें तो) ‘दक्षिणपंथी राजनीति’ क्या होती है? जितना हम सारे लोगों के अनुभवों में दर्ज इतिहास की दास्ताँ है उससे हम जानते हैं कि ‘चुप’ करा देने की दक्षिणपंथी राजनीति कैसे और किन तर्कों से काम करती है? ऐसा कहा जा सकता है कि इस राजनीति के भीतर ‘डायलाग’(dialogue) की वैसी कोई सम्भावना नहीं होती है, जैसे कि जेएनयू में मई दिवस के सन्दर्भ में हम कर रहे हैं? अगर यह सही है तो, दोनों तरह की राजनीति न सिर्फ क्वांटिटी बल्कि क्वालिटी के स्तर पर भी भिन्न होगी. अगर थोडा बहुत इस ‘दक्षिणपंथी राजनीति को ‘बहस या डायलाग’ में खींच कर लाया जा सका है तो उन कारणों और प्रक्रियाओं पर भी गौर करना जरूरी हो जाता है जिनके चलते शक्ति-संतुलन को बदलने-बनाने की कोशिश समाज के भीतर हर वर्ग अपने-अपने तरीके से करता है. तथा उसी प्रक्रिया और अनुपात में सामने वाले वर्ग को भी प्रभावित करता है. क्या यह नहीं कहा जा सकता है कि ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ के लिए संघर्षरत जेएनयूएसयू जैसे मंच और उसकी राजनीति को निश्चय ही इन शक्तियों से अक्सर मुठभेड़ करनी पड़ती है. इस पोजीशन के साथ खड़े होते हुए कि त्रिथा प्रकरण में और ज्यादा बेहतर तरीके से हस्तक्षेप किये जाने की आवश्यकता थी, मैं यह कहने की कोशिश कर रहा हूँ कि सरलीकरण और सरल तुलनाओं से बचा जाए. यहाँ पर एक सक्रिय बुद्धिजीवी की भूमिका जेएनयूएसयू जैसे मंचों को अपनी सूक्ष्म अंतर्दृष्टि और आलोचनात्मकता से लैस करने की हो सकती है.

             अगर राजनीति विभिन्न तबको/वर्गों/श्रेणियों द्वारा अपने आपको संगठित कर सत्ता संरचना में हस्तक्षेप करने की जरूरत से पैदा होती है तो यह ध्यान देना जरूरी है कि राजनीति में प्रतीकों का इस्तेमाल किया जाता है, प्रतीक अपनेआप में राजनीति नहीं होते. इन किस्म-किस्म के प्रतीकों में अर्थ/अनर्थ और छवियाँ भरने का काम हर दौर में विभिन्न तबकों की राजनीति अलग-अलग तरीके से करती है. इस प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट समझ रखना निहायत जरूरी है.

              राजनीतिक रस्साकशी के विभिन्न स्तरों पर कार्यरत समाज के विभिन्न तबको से तमाम प्रतीकों के ‘ओरिजिन’ के ज्ञान की पेशेवराना मांग करना या रिक्लेम किये जाने का आह्वान करना, संभव है कि एक दूसरे किस्म के दुष्चक्र को ही पैदा करे.

               हमारी राजनीति क्या होनी चाहिए? इस दौर में हमें ब्राह्मणवाद को कमजोर करना है या ‘गणपति’ को उसके चंगुल से मुक्त करना है? मुझे लगता है कि हमें ब्राह्मणवाद को कमजोर करना है. इस प्रक्रिया में ‘गणपति’ मुक्त भी हो सकते हैं और गायब भी हो सकते हैं! और ऐसा हमारे उन सारे प्रतीकों और भूत के साथ एक आलोचनात्मक ऐतिहासिक दृष्टिसंपन्न रिश्ते के चलते होगा.

              अपनी राजनीति का वर्चस्व स्थापित करने में हमें तमाम नये प्रतीक गढ़ने होंगे और यह भी संभव है कि कुछ पुराने प्रतीकों, छवियों का नवोन्मेष भी हो. लेकिन क्या हम मुख्यतः प्रतीकों को मुक्त कराने की लड़ाई लड़ेंगे या वर्तमान को बदलने की प्रक्रिया में प्राचीन का, उसकी छवियों का भी पुनुर्त्थान होता हुआ देखेंगे और प्रयास करेंगे? यहाँ पर ऐसा प्रतीत हो सकता है कि किसी को लगे कि प्रतीकों को मुक्त करने की लड़ाई, वर्तमान को बदलने के संघर्ष से अलहदा है पर वास्तव में ऐसा नहीं है. ऐतिहासिक प्रक्रिया में रूढ हो चुके कुछ प्रतीकों को हम छोड़कर आगे बढ़ेंगे और कुछ नए प्रतीक/छवियाँ गढ़ेंगे. बुद्धिजीवी को इस प्रक्रिया में अपना पार्ट तो अदा करना ही होगा!

            यह कहना भी मौजूं है कि जहाँ जरूरी है कि हम संस्कृत और सभ्यता के उलझे सवालों, प्रतीकों और घुमावों को समझे, उतना ही यह जानना भी जरूरी है कि इन तमाम मिथकों, छवियों और प्रतीकों की वर्तमान समय में उपस्थिति/प्रस्तुति किन-किन ध्वनियों, संकेतों और मंतव्यों के साथ हो रही है. वो लोग, जो मुक्ति की लड़ाई के हमवार हैं लेकिन संभवतः बुद्धिजीवियों/पेशेवरों जैसी दक्षता नहीं रखते (जिसके अपने सामाजिक ऐतिहासिक कारण हैं) वे किन-किन नजरियों से या नजरिये से इन प्रतीकों को देखते हैं और मुक्ति की उनकी रोजाना लड़ाई में ये प्रतीक/छवियाँ किस ओर खड़े दिखते हैं? इस बात से हमें नजर नहीं चुरानी चाहिए.

              हम ऐसा क्यों करते है? क्यों हमारे कुछ दोस्त इस बात से आहत हैं और कहीं न कहीं उनकी भाषा में गुस्सा, दुःख और कुछ खो जाने की अनुभूति तैरती है?

              इस व्यवस्था से निकली तमाम संरचनात्मक, संस्थात्मक एवं सांस्कृतिक शक्तियां छात्रों-युवाओं को किस तरह शोषण के विभिन्न रूपों और इतिहास की पहचान से वंचित रखते हैं, साथ ही साथ वे किस तरह संघर्ष के इतिहास को भी मिटाने की कोशिश करते हैं, हम सब ये जानते हैं. ‘आज़ादी और अवसर’ के ‘उदारवादी’ रिटारिक के झांसे में शासक उलझे हुए सवालों का आसान जवाब प्रस्तावित करते हैं जहाँ जीवन के विपरीत अनुभवों पर चर्चा करके चेतना विकसित करने का स्पेस नहीं होता. बाँध-बूंध कर रखे गये युवाओं के इस समुदाय से जब चेतनासंपन्न युवाओं का एक तबका बाहर निकलकर इस शोषण की विभिन्न संरचनाओं/संस्कृतियों/संस्थाओं को चुनौती देता है, तो उसी समय वह हर रोज अपनी पहले की समझदारी को भी तोड़ता जाता है पर सब एक साथ नहीं तोड़ पाता है. इसीलिये संघर्ष के टेढ़े-मेढे रास्तों में यदि वह कई जगह गिरता/फिसलता है तो निश्चय ही वह अपने नए अनुभवों से सीखता हुआ पुराने को छोड़ रहा होता है. यहाँ पर आंदोलनों के एक अनुभवी भागीदार और सिद्धांतकार के बतौर कठिन परिस्थितियों में आंदोलन की स्पिरिट को ऊँचा रखने और नए अनुभवों को बेहतर तरीके से सूत्रबद्ध करने के रूप में ‘आर्गेनिक’ बुद्धिजीवी की   भूमिका एक बहुत ही महत्वपूर्ण शक्ल अख्तियार कर लेती है. इस बुद्धिजीवी का स्वर समाज के अन्य ‘स्थापित बुद्धिजीवियों’ के स्वर से अलग होता है, जो हमेशा युवाओं की इस नई पौध को ख़ारिज व बदनाम करते हैं. इसी प्रक्रिया में युवा इस बुद्धिजीवी पर भरोसा करते हैं और संघर्ष के कठिन समय में उसकी मदद लेते हैं. बुद्धिजीवियों को यह बात समझनी होगी कि व्यवहार से ज्ञान प्राप्त करने की इस प्रक्रिया में ऐसे क्षण जरूर आयेंगे.

पुनश्च: इस लेख को पूरा करने में विशेष तौर पर कॉ सनी, कॉ अनमोल, कॉ सौरभ नरूका और कॉ रामनरेश राम से हुई बातचीत का काफी योगदान है.

संदीप सिंह जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष हैं और वामपंथी छात्र संगठन आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. इनसे sandeep.aisa@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

साभार-bargad

Single Post Navigation

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: