जहां सत्य छल से बिंधा है….

By  चन्दन श्रीवास्तव

“ वह सभा, सभा नहीं होती जिसमें बुजुर्ग ना बैठे हों। वे बुजुर्ग, बुजुर्ग कहलाने के योग्य नहीं हैं, जो सत्य ना बोलते हों और वह सत्य, सत्य कहलाने का अधिकारी नहीं है, जो छल से बिंधा हो-” धृतराष्ट्र की सभा में केश खींचकर लायी जाती हुई द्रौपदी ने यही कहा था उस न्याय-सभा के विवेक पर जिसमें विदुर और भीष्म सरीखे धर्मज्ञानी बैठे थे मगर जो सभा उसका चीरहरण होते देख बस टुकुर-टुकुर ताक रही थी।

अपने अस्तित्व के साठ साल पूरे कर लेने का जश्न मनाती संसद जब एनसीईआरटी की राजनीति-विज्ञान की 11 वीं क्लास की किताब के एक पन्ने पर छपे कार्टून को बाबासाहब आंबेडकर का अपमान मानकर पढ़ रही थी और किताब को पाठ्यक्रम से हटाने के तुगलकी फरमान सुना रही थी तो द्रौपदी का यह मर्मवेधी वाक्य बार-बार याद आया। इसलिए, कि संसद जहां सत्य की कसौटी ही है तर्कसंगत बहस वहां इस पुस्तक पर फैसला सुनाने से पहले कोई बहस नहीं हुई। युवा और नौसिखुआ नहीं, पक्ष-विपक्ष के बूढ़े-सयाने सांसद बिना बहस के समवेत स्वर में बोले- हां.. हां.. बंद होनी चाहिए यह किताब। हां..हां..इस कार्टून से हुआ है बाबा साहब का अपमान।

खोजिए, इस पूरे प्रकरण में किताब में छपे कार्टून को पढ़ने और जान-समझकर उसके औचित्य पर बहस करने की फिक्र किसको थी ? स्थापना की साठवीं सालगिरह मना रही संसद के सर्वाधिक बुजुर्ग सांसद आलोचक-राष्ट्र बनने की अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह आंबेडकर को भगवान की एक मूर्ति और खुद को इस मूर्ति के भक्त में बदलकर कर रहे थे। उनके सामने यह सवाल नहीं था कि बाबा साहब आंबेडकर की मूर्ति में हाथ की एक अंगुली हमेशा हवा में उठी हुई क्यों दिखायी जाती है ? वे भूल गए कि यह अंगुली शंका में उठी अंगुली है, जो आज दिन तक अपनी तरफ प्रेरणा पाने के ख्याल से देखने वाली आंखों को यही सिखाती है कि कानोसुनी या आंखोंदेखी को यों ही मत मान लो- उसे तर्क की तुला पर जांचो, उसके होने के औचित्य पर बहस करो और बहस के बाद किसी चीज के अच्छा-बुरा होने ना होने को लेकर अपना मत स्थिर करो। संसद के सबसे बुजुर्ग सांसद संसदीय परंपरा के निर्वाह की साठवीं बरसी पर वह बुनियादी वाक्य भूल गए जो कभी उसी संसद में संविधान की प्रति सौंपते हुए बाबा साहब आंबेडकर ने कही थी- “धर्म के क्षेत्र में भक्ति भले आत्मा की मुक्ति का एक रास्ता हो लेकिन राजनीति में भक्ति या फिर नायक-पूजा आत्महीनता और तानाशाही का सुनिश्चित रास्ता है। ’’

पाठ्यपुस्तक में छपे कार्टून के औचित्य के बारे में बहस नहीं हुई क्योंकि सत्य को पहले से ही तय मान लिया गया और संसद के सामने सवाल महज इतना भर रह गया कि कार्टून को छापने के अपराध में बलि किसकी ली जाये। किसी का फैसला था- एक कार्टून की बलि ली जाएगी, किसी का फैसला था पूरी किताब की बलि ली जाएगी तो किसी ने कहा कि बलि के रुप में विभागीय मंत्री के इस्तीफे से कम कुछ भी मंजूर नहीं। जिस सत्य को बिना बहस के मान लिया गया हो, उसे बोलचाल की भाषा में स्वार्थ और पढ़ाई-लिखाई की भाषा में पूर्वग्रह कहते हैं। और, द्रौपदी ऐसे ही सत्य को छल से बिंधा हुआ कहकर धृतराष्ट्र की सभा के न्याय-बोध पर सवाल उठा रही थी।

क्या है उस कार्टून में जिसके लिए पढ़ाई की एक किताब को कालेपानी की सज़ा सुनायी गई है? देश के संविधान को बनाने में तनिक देर हुई, तकरीबन तीन साल में बना हमारा संविधान। मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर पिल्लै ने साल 1949 में इस तथ्य को रेखांकित करते हुए एक कार्टून बनाया। कार्टून में एक घोंघा है, उसपर संविधान लिखा है। उसपर आंबेडकर हाथ में चाबुक लेकर बैठे हैं। उनके पीछे नेहरु हैं- उनके हाथ में भी चाबुक है। जैसे हिन्दीभाषा में धीमी चाल को कछुए की गति से जोड़ते हैं उसी तरह अंग्रेजी भाषा में धीमी चाल के लिए मुहावरा है स्नेलपेस यानी घोंघा-चाल। चाल मंद्धिम हो तो तेज करने के लिए चाबुक फटकारी जाती है। कार्टून में संविधान-निर्माण की प्रक्रिया को तेज करने के लिए चाबुक आंबेडकर को फटकारते दिखाया गया है, और अंतरिम सरकार के प्रधान की हैसियत से नेहरु को। खोजिए, इस तथ्य में अपमान कहां है? वह पीठ किसकी है जिस पर चाबुक फटकारा जा रहा है?

संविधान के निर्माण में देरी का तथ्य उस वक्त कितना मानीखेज था यह समझना हो तो गौर करें एक राष्ट्र के रुप में पाकिस्तान के हश्र पर जो अपना राष्ट्रगान तय कर पाया साल 1954 में और अपना संविधान बना पाया 1956 में। भारत का संविधान विभाजन की त्रासदी के वक्त बन रहा था। देश के सामने सवाल था- जैसे पाकिस्तान धर्म के आधार पर बना वैसे ही भारत भी एक धर्म-समुदाय का देश बनकर रह जाएगा ? देश रजवाड़ों में बंटा था और सवाल था- एकीकरण के बाद देश के शासन का स्वरुप एकात्मक होगा या संघात्मक ? कश्मीर में पाकिस्तान के हमले के बीच देश की नियति को तय करने वाले अनुत्तरित सैकड़ों सवाल थे और  उत्तर संविधान ही दे सकता था। अपने वजूद के सवाल से जूझते देश को संविधान की तत्काल जरुरत थी, इसलिए उस वक्त संविधान-निर्माण में देरी का सवाल एक महत्वपूर्ण सवाल था। कार्टूनिस्ट ने इस देरी को लक्ष्य किया। लेकिन, जीवित रहते जिस कार्टून से ना आंबेडकर को तकलीफ हुई ना ही नेहरु को वही कार्टून किताब में शामिल किए जाने के छह साल बाद भरी संसद में दलित-अस्मिता के अपमान का वाचक मानकर पढ़ा गया। किसी ने जानने की कोशिश ना कि कार्टून पर विद्यार्थी का ध्यान खींचकर पूछा गया है कि संविधान-निर्माण में अनपेक्षित देरी क्यों हुई और जवाब दिया गया है कि हमारा संविधान गहरी और विस्तृत चर्चा के बाद बना, इसलिए देरी तो हुई मगर बाकी देशों के संविधान की तुलना में बेहतर बना।

सवाल पूछा जा सकता है कि कार्टून की जगह अखबारों और पत्रिकाओं में होती है तो उसे पाठ्यपुस्तक में क्यों दिया गया ? एनसीईआरटी की सारी किताबें सरकार की नई पाठ्यचर्या नीति की बातों को ध्यान में रखकर लिखी गईं। नई पाठ्यचर्या की नीति में कहा गया था कि किताबें विद्यार्थी को तोतारटंत बनाने के लिए नहीं होती, उसके दिमाग को सूचनाओं से बोझिल और सोच पर बने-बनाये फैसलों की छाप बैठाने के लिए नहीं होती। किताब होती है- विद्यार्थी में स्वतंत्र सोच विकसित करने के लिए। एनसीईआरटी की किताब के स्वरुप में बदलाव और कार्टून समेत कई नई तरकीबों को जगह देने का फैसला इसी आलोक में किया गया।और अब, संसद ने पाठ्यपुस्तक में शामिल आंबेडकर के कार्टून के कुपाठ की आड़ में जो फैसला सुनाया है, उसे साबित हो गया है कि राजनीतिक पार्टियों को जरुरत अपने फैसलों पर हामी भरने वाले भक्त कार्यकर्ताओं की है, सवाल पूछने वाले उन नागरिकों की नहीं जिससे एक आलोचक-राष्ट्र बनता है।

चन्दन श्रीवास्तव

हिंदी -पब्लिक स्फिअर से सम्बंधित विषय में जे.एन.यू. से पीएच.डी.
फ़िलहाल सी.एस.डी.एस. में
उनसे chandan@csds.in पर संपर्क किया जा सकता है.

साभार – बरगद

Single Post Navigation

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: