लोकप्रियतावाद और सेंसरशिप बनाम कलाभिव्यक्ति और सहिष्णुता. वक्रतुंड महाकाय…

By मार्तंड प्रगल्भ

बहस-मुहाबसों और वाम-राजनीति के लिए जाने जाने वाले जे.एन.यु  परिसर की एक सांस्कृतिक-संध्या आज-कल चर्चा का विषय बनी हुई है. इस चर्चा ने कुछ महत्वपूर्ण और मौजूं सवालों को केंद्र में लाया है. उन सवालों से उलझने के पहले हम उस खास सांस्कृतिक-संध्या और और उस खास घटना का ज़िक्र करना चाहेंगे जिसने मौजूदा विवाद को जन्म दिया है.

          बात पहली मई की है. पहली मई यानी मजदूर-दिवस की है. इस मजदूर दिवस के दिन जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्र-संघ की ओर से पाकिस्तान के वामपंथी सांस्कृतिक संगठन ‘लाल बैंड’ को आमंत्रित किया गया था, जिसने इस खास कार्यक्रम के लिए ही अपनी भारत-यात्रा को मई की दूसरी तारीख तक बढ़ा दिया था.वरना वो तो पहले ही पाकिस्तान लौट गए होते. साथ में जनसंस्कृति मंच के सांस्कृतिक संगठन ‘हिरावल’ को भी पटना से खास तौर पर बुलाया गया था और जिसने फैज़ अहमद फैज़ की मशहूर नज़्म ‘इन्तिसाब’ से इस शाम का आगाज़ करना था.  तयशुदा ढंग से ही कार्यक्रम शुरू हुआ. और इन्तिसाब के बाद मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ का एक हिस्सा ‘ओ मेरे आदर्शवादी मन’ ,वीरेन डंगवाल की ‘हमारा समाज’ और ‘विश्व के बाज़ार की खिल्ली उडाता’ ,गोरख के नवगीत को समर्पित दिनेश कुमार शुक्ल की ‘जाग मेरे मनमछंदर’ तक आते आते ‘हिरावल’ ने संगीत की एक प्रतिसंस्कृति में श्रोताओं को गहरे उतार दिया. और ऎसी स्थिति में यह एकदम स्वाभाविक था कि श्रोताओं की मांग पर  छात्र-संघ को ‘हिरावल’ से गोरख के गीत ‘जनता की आवे पलटनिया’ गाने की अपील करनी पडी. जिन लोगों को जे.एन.यु. की छात्र राजनीति से थोडा भी साबका है वो जानते हैं कि यह गीत जे.एन.यु में कितना ‘लोकप्रिय’ है और इसकी लोकप्रियता में आन्दोलनों के दौरान गीत के सामूहिक गायन और ‘हिरावल’ का उस गायन की प्रेरणा में कितना योगदान है.  ‘जनता की आवे पलटनिया’ के साथ ‘हिरावल’ मंच से विदा लेता है और ‘लाल’ के तैमूर रहमान एक छोटे से परिचय के बाद त्रिथा को मंच पर आमंत्रित करते हैं. कोई नहीं जानता था ये त्रिथा कौन है और न ही कार्यक्रम के पहले लाल ने ‘छात्र-संघ’ को इसके बारे में कोई सूचना ही दी थी. जबकी खुद तैमूर शाम के दो घंटे उस मुक्ताकाशी मंच पर पहले ही साउंड वैगेरह की जांच कर के गए थे. इस औचक आमंत्रण से दर्शकों को एक झटका तो लगा ही था. उस गायिका के बारे में खुद तैमूर भी कुछ नहीं जानते थे सिवाय इसके कि उसके बैंड ने उन्हें दिल्ली में हुए इस शो के लिए साजो सामान मुहैय्या किया था. बहरहाल ये जे.एन.यु था जिसने इस अचकचाहट से निकल कर उस गायिका की सधी आवाज़ और रागों के उसके प्रयोग को सुना. शुद्ध रागों के प्रयोग तक श्रोताओं ने उसकी तालियाँ बजा कर सराहना भी की. लेकिन बात तब बिगड गयी जब अपने तीसरे नम्बर के रूप में उसने ‘गणेश वन्दना’ आरम्भ किया. इस गाने के साथ श्रोताओं की ओर से इसे न सुनाने और लाल को आने की  मांग शुरू हो गयी. तत्काल छात्र-संघ ने तैमूर से संपर्क किया और बताया कि यह एक धार्मिक वन्दना है और इस मंच के लिए अनुपयुक्त है. मंच के पीछे से तैमूर और छात्र-संघ अध्यक्षा ने गाने को रोकने का संकेत भी किया लेकिन  शायद त्रिथा इधर देख नहीं पायी और मजबूरन अध्यक्षा को मंच पे जा के त्रिथा से गाना रोकने की अपील करनी पडी. तुरंत तैमूर ने भी इसे गंभीर मानते हुए मंच पर जाकर बहुत हलके ढंग से शुरू किया… ‘आइये अब कुछ समाजवादी दुनिया के बारे में बात करें’!

बहस के केंद्र में यही अंतिम घटना है. इस घटना की आलोचना करते हुए अपूर्वानंद ने और साथी मीरा ने इसे क्रमशः ‘कलाभिव्यक्ति की हत्या’ और  ‘अविश्वसनीय असहिष्णुता’ एवं ‘लोकप्रियता और उपेक्षा के मेलजोल से लगने वाला सेंसरशिप’ कहा है. अपूर्वानंद की आलोचना और उसकी भाषा निहायत ही गैरजिम्मेदाराना और जे.एन.यु. की वाम राजनीति की और प्रकांतर से दुनिया भर के मेहनतकशों के पक्ष में खड़े होने वाली कला की उपेक्षा करने वाली थी. छात्र-संघ के  इस आयोजन और उस आयोजन में शामिल श्रोताओं के बारे में अपूर्वानंद की टिप्पणी और उसकी भाषा पर गौर करें- “निश्चय ही त्रिथा को यह प्रसंग या तो पता न होगा या वे इसे भूल गईं जब मई दिवस पर जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में  एक वामपंथी छात्र संगठन द्वारा आयोजित एक संगीत संध्या में मंच पर वे  अनामंत्रित गाने चली गईं. एक तो वे स्वयं अनपेक्षित , अतः किंचित अस्वस्तिकर उपस्थिति थीं , दूसरे आयोजकों और श्रोताओं  को, जो मई दिवस पर संघर्ष और क्रान्ति के जुझारू गीत सुन कर अपने शरीर के भीतर जोश  भरने आये थे इसकी आशंका थी कि वे इस पवित्र अवसर पर जाने  क्या गा देंगी.” ऐसा लगता है कि बाकी लोग जो वहाँ पहुंचे थे वो क्रान्ति के जुझारू गीतों से शरीर में जोश भरने आये थे और अपूर्वानंद गणेश वन्दना या हनुमान चालीसा या महादेव मन्त्र या दुर्गा मन्त्र सुनने!! और ताज्जुब नहीं कि गणेश से लेकर देवी और महादेव के मिथक किसी समय गैरब्राह्मणीय और जनजातीय या ‘अनार्य’(!)व्युत्पत्ति वाले ही हैं! आगे उन्होंने हिरावल के सादे ढंग से पेश किये गए गीतों के बारे में लिखा “ अपने सादा अंदाज में उन्होंने जो सुनाया ,वह वहां इकट्ठा जन समुदाय की इच्छाओं के मुताबिक़ ही था”. क्या थी वहाँ इकट्ठे जनसमुदाय की इच्छा? हिरावल के गीतों में व्यक्त होती चेतना अगर सर्वहारा चेतना के साथ थी और उसे समृद्ध करने वाली थी तो यह तो तय है कि वहाँ उपस्थित जनसमुदाय मई दिवस के दिन जिस संगीत के लिए एकत्रित हुआ था वह कला और संस्कृति के वर्गीय सौंदर्यबोध और उसकी सापेक्ष स्वायत्तता से वाकिफ था. और यही कारण है कि त्रिथा के पहले दो नंबरों को उचित सम्मान भी मिला. आखिर ‘वक्रतुंड महाकाय’ के गाते ही यह जनसमुदाय क्यों विरोध करने लगा? विरोध करने लगा क्योंकि वर्ग-विभाजित समाज में समाज की अभिव्यक्ति जब कला और संस्कृति में होती है तो वह भी वर्गीय प्रभुत्व के दायरे से मुक्त नहीं होती. वर्चस्वशील संस्कृति की अभिव्यक्ति का नकार क्या कला-अभिव्यक्ति की हत्या है? फिर कलाभिव्यक्ति या कला की स्वतन्त्रता का क्या अभिप्राय है? क्या कला की स्वतन्त्रता से लेकर व्यक्ति-स्वातंत्र्य के नारे हमें शीतयुद्धकालीन अमेरिकी विचारधारा की याद नहीं दिलाते. और तब क्या इस कलाभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अर्थ हमें ज्यादा करीब से समझ नहीं आने लगता. और इसी बात को अपूर्वानंद बड़े नैतिक ताकत के साथ आज व्यक्त कर रहे हैं. क्या यह इतिहास के दुहराव का प्रहसन है! और हद तो तब है जब इसकी तुलना वह मकबूल फ़िदा हुसैन और रामानुजम की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा के प्रसंग से करते हैं!

          कलाभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पैरोकारों को कलाभिव्यक्ति और कला में निहित प्रगतिशील तत्त्वों को नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए. खुद कला के भीतर नवोन्मेष कला को नवीन बनाता है. और इस नवोन्मेष में उस समय और समाज की सच्चाई को ज्यादा बेहतर अभिव्यक्ति मिलती है. और हमें इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए आखिरी लम्हे तक लड़ना चाहिए. परन्तु क्या ‘वक्रतुंड महाकाय’ का वह गायन इनमें से कोई भी काम कर रहा था? और अगर नहीं तो सचेतन जनसमुदाय की इच्छा को छात्र-संघ, जो खुद ही उस चेतना की भौतिक अभिव्यक्ति है, को अगर पूरा करता है तो इसको स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति की ‘सामूहिक हत्या’ जैसे चालबाजी भरे शब्दों से संबोधित करना क्या कहा जाएगा!

          बुर्जुआ उदारवादी पदावली में सोचने वाले अपूर्वानंद जैसे गैरावयाविक बुद्धिजीवी कैसे खुद उसी उदारवादी प्रोपगैंडा के शिकार हो जाते हैं , यह उसका सटीक प्रमाण है. यह बुर्जुआ-उदारवादी ‘स्वतन्त्रता’ कितनी आवाजों की खामोशी को ढंकने की साजिश है इसे विस्तार से बताने की ज़रूरत नहीं है. इस स्वतन्त्रता को पुष्ट करने के लिए ऐसे बुद्धिजीवी इतिहास की गैरैतिहासिक व्याख्याओं का भी सहारा लेते हैं. और गणपति गायन की तुलना सूफी और संत गीतों से करते हैं. क्या कबीर और फरीद के जिन गीतों को हम सराहते हैं उसमे और गणपति गायन में कोई फर्क नहीं? क्या ‘गणपति वन्दना’ जैसी वन्दनाओं के मूल्यों के खिलाफ ही कबीर खड़े नहीं थे? और यह भी नहीं है कि सूफियों और संतों के धार्मिक और रहस्यवादी पदों का विरोध नहीं किया जाए. हम तो सर्वहारा की मुक्ति चेतना को इससे नहीं आंकते. लेकिन अगर आज भी कबीरादि के पद प्रासंगिक हैं तो इसलिए कि वह सर्वहारा के मुक्ति के पक्ष में अपना योगदान दे रहे हैं. क्या गणेश-वन्दना की भी प्रासंगिकता ऎसी ही है?

          इस बूर्ज्वा उदारवादी चिंतन ने मार्क्स को भी अपने तई उपयोग किया है. और इसका भी गैरसंदर्भित प्रयास अपूर्वानंद के यहाँ मिलता है जब बिलावजह अपने तर्कों में जोर लाने के लिए ई.प.एम(१८४४ की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपि) को उद्धृत करते हैं. उनका मानना है कि पूँजीवाद में श्रम और श्रम के अलगाव को जे.एन यु. के छात्र न तो महसूस करते हैं और न ही वो श्रमिक वर्ग की विचारधारा को समझते हैं. असल में जैसा वो खुद हैं वैसा ही दूसरों को भी मानते हैं. एक गैर आवाविक बुद्धिजीवी जो फिलहाल कम्युनिस्ट विरोधी है. मैं नहीं मानता कि जे.एन.यु के सभी छात्र श्रमिक वर्ग की विचारधारा को आभ्यंत्रीकृत कर चुके हैं . लेकिन अगर वर्त्तमान छात्र-संघ उनकी संभावित चेतना का मूर्त रूप है और जिसे हम गर्व से कहते हैं, तो कम्युनिस्ट छात्र-आंदोलन के इस ‘हिरावल’ को बदनाम करने की कोशिश क्या कही जाएगी! और इस बदनामी में वो सब लोग भी निशाने पर हैं जो इस दिल्ली शहर के भीतर एक सही कम्युनिस्ट राजनीति के लिए समर्पित हैं. और जो अपूर्वानंद की तरह कला की जनवादिता को केवल जनता की रची कला मानने के संकीर्णतावाद को नहीं मानते. तब  बेचारे ‘मुक्तिबोधों’ का क्या होगा! और तो और श्रमिक वर्ग को भी अपूर्वानंद की खास काट की दृष्टि औद्योगिक क्रांति के वक्त पश्चिम में बनते नए श्रमिक वर्ग के चरित्र में थिर करती जान पड़ती हैं. उनके लिए न तो विश्विद्यालय के छात्र श्रमिक वर्ग से खुद को जोड़ सकते हैं  और न वैश्विक बाज़ार की मार से विलगित आत्म वाली किसी बैंड की गायिका.और दरअसल उस गीत का रोका जाना एक खास मौके पर था, एक खास समझदारी से था और यह मानते हुए था कि कला के उत्पादन में रत कोई कलाकार जब प्रभुत्वशाली वर्गों की कला को अनजाने ही व्यक्त करने लगे तो उसको रोका जाए.

          साथी मीरा का आलेख एक वाजिब चिंता के साथ विस्थापित(dislocated) विमर्श की भाषा में फंस गया है. यह एक वाजिब चिंता का बुर्जुआ विमर्श की भाषा के हाथों मिली चुनौती के सामने असहाय महसूस करना है. और इससे उबरने का एक मात्र रास्ता कला और राजनीति के रिश्तों की सही मार्क्सवादी-लेनिनवादी व्याख्या में ही है. उसका मानना है कि गीत को रोके जाने की यह घटना कला की उपेक्षा और लोकप्रियतावाद के सहारे सेंसरशिप का पक्ष लेती है. दरअसल बुर्जुआ लोकतंत्र के भीतर हम कम्युनिस्ट जब सेंसरशिप का विरोध करते हैं और ऐसा लगातार करना होता है, तब हम यह भूल जाते हैं कि किसी सेंसरशिप का हम विरोध क्यूँ करते हैं. हम दरअसल उस बहुसंख्यक आबादी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्ष लेते हुए बुर्जुआ उदारवादी लोकतंत्र का विरोध करते होते हैं. और अगर ऐसा नहीं है तो फिर हम क्यूँ जे.एन.यु. के भीतर इंदिरा गांधी ,मनमोहन सिंह और रिचर्ड बाउचेर से लेकर योगी आदित्यनाथ की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की हत्या करते! उस वक्त भी दक्षिणपंथी तर्क इसे  ‘सेंसरशिप’ ही  कहता है. और लोकप्रियता(poupularism) क्या सिर्फ पूंजी और बाज़ार का तर्क है? क्या हिटलर के फासिस्म के खिलाफ लोकप्रिय-मोर्चा कायम करने की मांग एक खास किस्म का पोपुलरिस्म था? उसी तरह सहिष्णुता की संवैधानिक और बुर्जुआ व्याख्याएं हमें इसे और ऐसे ही अन्य शब्दों को समझने की आलोचकीय क्षमता से महरूम करता है. क्या सहिष्णुता वर्ग-विभाजित समाज में, जाति विभाजित समाज में , लिंग विभाजित समाज में प्रभुत्व की स्वीकृति का माध्यम नहीं बन जाता. और हम कम्युनिस्ट जब सहिष्णुता की बात करते हैं तो इस बुर्जुआ लोकतंत्र को उसी की भाषा में चुनौती देते हैं , उन्हीं के नैतिक मूल्यों की बात करते हुए उन्हें बेनकाब करते हैं. और यह भी जानते हैं कि इतिहास के किसी क्षण में यह बुर्जुआ शब्द और मूल्य भी प्रगतिशील था. पर शब्द जब स्थान और काल का भेद भूल जाते हैं तो उसका क्रांतिकारी सार प्रभुत्व की विचारधारा का वाहक हो जाता है.

हमने ऊपर देखा कि उस खास जनसमुदाय की चेतना को गणेश वन्दना के गायन के गैरालोचकीय नकार के रूप में देखना दुखद है. और दुखद है कि इस घटना के कारण यह मानना कि देश भर के भीतर निरोधक कानूनों और दमनकारी कारवाईयों के विरोध करने की जे.एन.यु.एस.यु. की ऑथरिटी को धक्का लगेगा. क्या जे.एन.यु.एस.यु. अपनी संघर्ष और अपने विरोध की ऑथरिटी बुर्जुआ उदारवाद के निरपेक्ष मान लिए गए मूल्यों से ग्रहण करता है? नहीं हम विरोध की ऑथरिटी देश और दुनियाभर के शोषित और चुप करा दिये गए जनता से ग्रहण करते हैं. और इसी ऑथरिटी के सहारे उस दिन ऎसी घटना हुई थी.

          साथी मीरा के इतिहास की समझदारी की हम बहुत इज्जत करते हैं और इसलिए उस वक़्त हमें बड़ा झटका लगा जब इतिहास में मिथकों की व्युत्पत्ति और उनके वर्तमान राजनीतिक अर्थों के सन्दर्भ को उसने गलत तरीके से व्याख्यायित किया. यह सच है कि गणेश और बहुत सारे मिथकों की व्युत्त्पत्ति किसी कबीले या गण या आदिवासी समूहों से सम्बंधित हैं. वृन्दावन विहारी के रसिक गोपाल का मिथ भी तो गैर ब्राह्मणीय परम्परा से ही आया है. और अगर हजारी प्रसाद द्विवेदी की माने तो आज का हमारा सौंदर्यबोध जिन मूल्यों से बना है  उनमें अधिकाँश आर्येतर या गैर ब्राह्मणीय है. तो क्या हम उन सब को कला में आज भी वैसे ही स्वीकार करते जाएँ? क्या गणपति के चरित्र से महाराष्ट्र के मनसे और बाल ठाकरे की विचारधारा का कोई लेना देना नहीं है? या इस चरित्र का उपयोग करके जिन शोषणों को अंजाम दिया गया है उसे भूल जाएँ? और क्या आदिवासी और लोक से आने मात्र के कारण कोई मिथ या मूल्य स्वं ही प्रगतिशील हो जाता है? क्या लोक और आदिवासी समूहों के बारे में एक खास किस्म की शुद्धतावादी और प्रगतिशील रूमानियत का विरोध ज़रूरी नहीं? क्या गणेश वन्दना आदिवासी व्युत्पत्ति मात्र से प्रगतिशील हो जाती है? क्या आदिवासी व्युत्पत्ति परक मिथकों की पूजा करके दलित राजनीति का एक हिस्सा सचमुच मुक्ति की लड़ाई में प्रगतिशील भूमिका अदा कर रहा है? क्या व्युत्पति के कारणों की पड़ताल करने वाला इतिहास ज़रूरी है कि इतिहासवादी(historicists) हो जाए? और इसे संस्कृत भाषा के गैरज़रूरी नुक्ते से भी जोडने की कोई ज़रूरत नहीं है. और ना ही भगत सिंह या चे के प्रतीकों के पूंजीवादी दक्षिणपंथी अप्प्रोप्रियेशन की तुलना धार्मिक मिथकों से की जानी चाहिए. और मई दिवस के मौके पर जे.एन.यु  जैसी जगह पर धार्मिक प्रतीक और मिथकों की व्युत्पत्ति परक व्याख्यायों को समझते हुए इसका विरोध ज़रूरी है. और ज़रूरी है एक ऐसे स्पेस को ज्यादा क्रान्तिधर्मी बनाना जिसे वर्षों के अथक प्रयास से छात्र राजनीति ने जे.एन.यु. में हासिल किया है.

          मान लीजिए त्रिथा के गायन के विषय के बारे में पहले से पता होता तो क्या उस मंच पे उसे आने दिया जाता? क्या जे.एन.यु.एस.यु के मंच से कोई अनजान नौजवान रामचरितमानस का पाठ करने की इच्छा व्यक्त करे तो हम उसे मौक़ा देंगे? क्या कला की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर राहुल गांधी या नरेन्द्र मोदी को भाषण देने की स्वतन्त्रता उस मंच से देंगे? क्या राष्ट्रीय स्वम्सेवक संघ के किसी सदस्य को हम आने देंगे ? और क्या ऐसा जिस दिन होगा हम इस छात्र संघ को सचमुच समर्थन देंगे? साथी मीरा खुद इस छात्र-संघ में थीं और सचमुच उन्होंने ऐसा फैसला नहीं लिया था कभी. उनको भी पता है कि छात्र-संघ का ये मंच कैसे धीरे-धीरे और भी ज्यादा व्यापक जनसमुदाय की वास्तविक मुक्ति से खुद को जोडता जा रहा है या जोडने की कोशिश कर रहा है. हम मुक्ति का स्वप्न देखते हैं. बुर्जुआ स्वतन्त्रताओं से आगे स्वतन्त्रता का, मुक्ति का. मार्क्स के शब्दों में कहें तो हमें सिर्फ बहुवचन में ही अच्छी लगने वाली “स्वतन्त्रता” पसंद नहीं…सीमित ‘स्वतंत्रताओं’ के क्षितिज ‘स्वतन्त्रता’ के लिए कितने खतरनाक हैं, यह बड़े ऐतिहासिक दायरे में साबित हो गया है.(कार्ल मार्क्स , “प्रेस की स्वतन्त्रता पर विवाद”, संकलित रचनाएँ वोल.१ मोस्को १९७५, पृष्ठ-१७८) और स्वंत्रता का मतलब है सर्वहारा की स्वंत्रता, जिसके सहारे ही सम्पूर्ण मुक्ति संभव है. और इस बार मई दिवस इसी मुक्ति के संगीत के लिए था.

 मार्तंड प्रगल्भ जे.एन.यू. के भारतीय भाषा केंद्र में पी.एच.डी. के लिए शोधरत    हैं.

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9 thoughts on “लोकप्रियतावाद और सेंसरशिप बनाम कलाभिव्यक्ति और सहिष्णुता. वक्रतुंड महाकाय…

  1. Aditya_R on said:

    Thank you Martand!

    Excellent Critique. Comes like a breath of fresh air. ..I was feeling rather suffocated with all the discussion that followed Meera’s post… what with the talk of ‘Red Terrorism’ and ‘Populist Censorship’.

    This is a befitting reply to the bourgeoisie reformist sensibilities that are recurring again and again in earlier threads. Martand’s piece cuts to size the entire debate as to how the ‘Tritha-incident’ should actually be perceived.

    More importantly, for me, it convincingly theorizes how such terms as – ‘freedom of expression’ ‘art’ and ‘culture’, should be understood through the prism of marxism-leninism and thus in the interest of the revolutionary endevours.

  2. Aditya_R on said:

    I would propose that this calls for an experiment for establishing such ‘exlusive’ creative spaces, in which one can ‘actually’ invert bourgeois cultural artifacts and turn them into counter-hegemonic mediums. Probably then we can have listen to a ‘new’ Ganesh Vandana at the same time get ‘better’ educated in the history of politics of culture (as is being desired by some people on earlier posts).

  3. "populist" on said:

    @aditya_r “should” “should” “should” “should” “should” should”

  4. "populist" on said:

    @aditya_r So do I. Just expressed. “Should” n’t I?

  5. Anubhuti Agnes Bara on said:

    Martand Da, there could not have been a reply better this!

  6. vikas on said:

    अगर आपकी रूचि इस बहस में है तो इस कड़ी का नवीनतम लेख जरूर पढ़ें. लिंक है http://www.debateonline.in/abhivyakti-ki-aazadi-aur-nak-ka-sawal/

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