स्वप्न, चश्मा और ७ अप्रैल

By उदयशंकर 
आज ६ अप्रैल है. लेकिन इसका कोई भी सम्बन्ध ६ अप्रैल से नहीं है. ७ अप्रैल से है. आज जबकि आधी रात के बाद ७ अप्रैल आ जाएगा , मैं आँखें बंद किये सो रहा हूँ. कुछ सोच रहा हूँ या स्वप्न देख  रहा हूँ! मेरे एक दोस्त ने कभी कहा था कि दिन की नींद को भी सपने आते हैं. लेकिन, अंतर यह होता है कि उस सपने को नियंत्रित किया जा सकता है. यही नियंत्रण सोचने और सपने के बीच के फर्क को बारीक कर रहा है. आँखें खोलना नहीं चाहता हूँ. ऐसा लगता है कि आँख खोलते ही चीजें गायब हो जायेंगी. इसीलिए उसे लम्बे समय तक बनाये रखने की कोशिश करता हूँ.
७ अप्रैल का सन्दर्भ सच भी हो सकता है और झूठ भी. लेकिन अपने-आप में ७ अप्रैल एक सच्चाई है. मैं अभी चाहूँ तो विकिपीडिया में टाइप कर के देख सकता हूँ कि ७ अप्रैल किन महान घटनाओं या व्यक्तिओं के साथ साझा हुआ है और ऐसा करते हुए इस दिन को मैं और भी महत्वपूर्ण बना सकता हूँ. लेकिन मुझे तो महान घटनाओं और व्यक्तिओं के आसरे की आशंका से भी बचने की आदत सी लग गयी है.

स्वप्न-1 मेरे नियंत्रित सपने में एक तस्वीर घूम जाती है. और, उसी फ्रेम में एक निर्दोष सी लड़की का आधा अक्श उभरता है. मन ही मन जीवन का पूरा फ्रेम कब समर्पित हुआ, सपने में पता नहीं चलता. फिर, उसे भी एक दिन सपना आता है. सपने में समुद्र का विपुल-विराट विस्तार और विस्तार के पार एक घना जंगल  है. वह पानी पर चलती हुई जंगल में समा जा जाती है. पानी पर चलने का राज उसने कभी मुझसे बताया था. वह कहती थी  कि पानी पर चलने के लिए पानी से हल्का होना पड़ता है और इसके लिए वह डाईटिंग करती है. इस कारण उसे चश्मा भी लगाना पड़ा. लेकिन पानी पर चलते हए वो चश्मा लगाना पसंद नहीं करती है. जंगल में मांस की एक दुकान है और दूकान के सटे एक जिमखाना भी. जिमखाना के बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘मांस-दान.. महा-दान’  लिखा है. मांस की दुकान पर पानी से भी हल्के हो चुके लोगों की एक लम्बी कतार है और उस कतार में वह सबसे आगे खड़ी है. एक दूसरी कतार भी है जो जिमखाना से शुरू होकर मांस  की दूकान तक जाती है. यह मांस-दाताओं की कतार है. मांस की दूकान पर एक डॉक्टर बैठा है. डॉक्टर जिमखाने वाली कतार के लोगों के पुट्ठे, बांह और पिंडलियों से ताज़ा मांस निकालकर तराजू में डालता-तोलता है और डाईटिंग वाली कतार के लोगों के थैलों में उड़ेलता जाता है. जिमखाने के घायल लोग दौड़ते हुए समुद्र में घुसते हैं और किनारे आकर समुद्र का नमक अपने जख्मों पर लपेट लेते हैं. मैं समुद्र के इस किनारे उसी के चश्मे को लगाये बैठा हूँ. वह थैला लिए लौटती है, पूरा बदन नमक और खून से सना है. मैं चश्मा लौटाने लगता हूँ तो कहती है कि पहने रहो, इसमें तुम  बच्चे लगते हो और  अच्छे भी. चश्मा खोलता हूँ  तो दूर का कुछ भी नहीं दिखता है, बस उसका नाम दिखता है, जिसे मैं समुद्र की लहरों के बावजूद बार-बार स्थिर करने की कोशिश करता हूँ. 

मुझे याद नहीं कि मैंने वो चश्मा वहीं छोड़ दिया या लगाया या फिर पता नहीं क्या किया! लेकिन, कल  जब ७ अप्रैल है तो उस नाम-दिन ने मुझे फिर से पकड़ लिया है और पता नहीं, कहाँ से उसके हाथे में वही चश्मा फिर से नमूदार हुआ. उसने उसे तोड़ दिया और कहा- मुझे बच्चे पसंद नहीं हैं और तुम आदमी अच्छे लगते हो.

Night Market

Night Market

 

स्वप्न के बाहर-
सपने के बाहर की सच्चाई इतनी भर है कि कल ७ अप्रैल है. और ,आज ६ अप्रैल  को एक कवि-मित्र से उसकी व्यक्तिगत सी लगती कुछ कवितायें सुनीं और उसके बारे में  चिंतित भी हुआ. फेसबुक पर एक स्टेट्स  लिखा- आंसुओं के टपकने की आवाज़ मोबाइल -फोन पर सुनाई नहीं पड़ती है. और हाँ अपना प्रोफाइल पिक्चर भी बदला और तस्वीर उस पुराने चिकित्सक की है जिसने पहली बार melancholia को विश्लेषित  किया था.
चित्र- http://www.enelojial.com/Paintings/2013/14-NightMarket.html

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