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शिप ऑफ थीसियस – अनहोनी और होनी की उदास रंगीनियाँ: उदय शंकर

BY उदय शंकर

शिप ऑफ थीसियस । सबसे पहले यह शीर्षक ही दर्शक को जिज्ञासु बनाता है। आनंद गांधी, जो फिल्म के लेखक-निर्देशक हैं, का मानना है कि यह शीर्षक मूलतः एक थॉट-एक्सपरिमेंट है जिसका प्रेरणा-स्रोत ‘शिप ऑफ थीसियस’ नामक एक विरोधाभासी (पैराडॉक्सिकल) गुत्थी है। वह गुत्थी इस रूप में है कि थीसियस ने एक जहाज बनाया था और सौ साल बाद उस जहाज का एक-एक पुर्जा बदल दिया गया। मतलब कि उस जहाज में अब कोई भी पुर्जा ऐसा नहीं बचा था जिसे थीसियस ने उसमें लगाया था। पहला सवाल यहीं पर आता है कि क्या यह 100 साल बाद वाला जहाज भी थीसियस का जहाज है या नया जहाज है? अगर नया है तो वह कौन सा समय, बिन्दु या पुर्जा है जहां से जहाज अपनी पहचान (Identity) का नवीकरण शुरू करता है। एक तरह की उलझन, विरोधाभास जिसका कोई तार्किक उत्तर या निष्कर्ष संभव नहीं है, पैराडॉक्स कहलाता है। किसी पैराडॉक्स का कोई भी निष्कर्ष या उत्तर अपने आप में, ‘पहले अंडा या मुर्गी’ टाइप का, उलझन पैदा करती है। इसी कारण से यह सवाल अस्तित्व के सवाल के आस-पास टीक जाता है और यही वह बिन्दु है जहां आनंद गांधी इस पैराडॉक्स को मानवीय जीवन-जगत के बीच में रख कर देखते हैं। शिप ऑफ थीसियस फिल्म इसी जिज्ञासा के साथ शुरू होती है (जैसा कि आनंद गांधी का कहना है) कि इंसान के शरीर की एक-एक कोशिका 7 साल के बाद बदल जाती है। इस बदलाव के कारण किसी भी इंसान में क्या-क्या परिवर्तन होते हैं? वह आदमी क्या वही रह जाता है या कुछ और हो जाता है? अगर वह कुछ और हो जाता है तो वह क्या है, जैसे अनगिनत सवाल उभरते हैं। इन सवालों का कोई भी तर्कसंगत उत्तर संभव नहीं है। बहुतों का तो यहाँ तक मानना है कि इस तरह के सवाल या बदलाव की कोई भी सम्पूर्ण अभिव्यक्ति भाषा में संभव नहीं है, भाषा में व्यक्त हुये ऐसे जिज्ञासु तेवर को कोई भी आसानी से बचकानी हरकत कह सकता है। इस तरह की जिज्ञासाओं को अनुभूत करने के लिए एक तरह की संवेदना की आवश्यकता होती है। मेरा मानना है कि विरोधाभासी गुत्थियों, जीवन-शैली-प्रक्रिया को दर्शाने के लिए सिनेमा बहुत ही अच्छा माध्यम है। शिप ऑफ थीसियस जीवन की सतत-प्रक्रिया में उभरने वाले विरोधाभास का बखान है, बिना किसी मूल्य-निर्णय के, सिर्फ बखान।

ship of theseus's Poster

ship of theseus’s Poster

शिप ऑफ थीसियस में यह बखान तीन कहानियों के माध्यम से सम्पन्न हुआ है। पहली कहानी नेत्रहीन फोटोग्राफर आलिया (आयदा-अल-काशेफ) की है। नेत्र रूपी अभावात्मक स्थिति को वह कैमेरे से संतुलित करती है। यह संतुलन ही उसकी पहचान (एक अच्छी और प्रशंसित फोटोग्राफर के रूप में) को निर्मित करती है। अभाव उसके लिए रचनात्मकता का स्रोत बन जाती है। वह ‘अपने अनुभव-संसार’ में खुद को सम्पूर्ण महसूस करती है। बाद में जब उसे आँखें और रोशनी वापस मिल जाती है तो वह खुद को असहज महसूस करती है। वह एक दूसरे अभावात्मक स्थिति में चली जाती है, फोटोग्राफी नहीं कर पाती है। भौतिक-अभाव की पूर्ति रचनात्मक-अभाव (पहचान का संकट) के रूप में प्रकट हो जाती है। यहीं पर सवाल खड़ा होता है कि आलिया की असली पहचान क्या है? आँख वापस आने के बाद वाली आलिया पुरानी आलिया से कितनी अलग है, नयी है या वही है? यह एक विरोधाभासी गुत्थी है।

 दूसरी कहानी मैत्रेय(नीरज कबि) नाम के एक श्वेतांबर साधु/भिक्षु की है। जिनके बारे में कहा जाता है कि वे साधु कम शास्त्री ज्यादा हैं। जीव-जंतुओं के अधिकारों और पर्यावरण को बचाने के लिए संघर्ष करते हैं। वे इस संघर्ष में किसी भी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं हैं और यही ‘नैतिक आवेग’ उनकी पहचान है। वे पेट की बीमारी से परेशान हैं लेकिन दवाइयाँ नहीं लेते हैं क्योंकि हर दवा के पीछे जीव-जंतुओं की हिंसा है। यही समस्या आगे जाकर लिवर सिरोसिस में तब्दील हो जाती है जिसका तत्काल इलाज बहुत जरूरी है क्योंकि समस्याएँ विकराल रूप धारण कर कैंसर में तब्दील हो सकती हैं। उनका नैतिक आवेग फिर आड़े आ जाता है और वे समझौता करने के बजाय जीवन को त्यागने का फैसला करते हुये आमरण अनशन की शुरुआत करते हैं। आमरण अनशन और बीमारी दोनों के प्रभाव ने उन्हें एक दिन अंदर से तोड़ दिया, जीने की ललक फिर से पैदा हो गई और डॉक्टर/दवा की सेवा लेने को तैयार हो गए। उनमें लिवर का प्रत्यारोपण (Liver Transplantation) किया जाता है और वे फिर से स्वस्थ्य हो जाते हैं। उनके स्वस्थ होने में जीव-हिंसा का योगदान शामिल हो गया। अब वे ‘श्वेतांबर साधु/भिक्षु’ नहीं रहते हैं। पहली कहानी की तरह ही यहाँ भी एक अभावात्मक स्थिति से दूसरी अभावात्मक स्थिति की ओर यात्रा है। दोनों स्थितियों में उत्पन्न हुये पहचान के संकट का कोई तर्कसंगत जवाब नहीं है, इसीलिए यह कहानी भी एक विरोधभासी-गुत्थी का निर्माण करता है।

तीसरी कहानी नवीन (सोहुम शाह) नामक एक स्टॉकब्रोकर की है। उपर्युक्त दोनों कहानियों से यह कहानी थोड़ी भिन्न है। पहली भिन्नता यह है कि शुरुआती दोनों कहानियों के पात्रों की ‘पहचान-यात्रा’ रचनात्मक-नैतिक पहचान से भौतिक पहचान की पूर्णता को पाने का है। इस कहानी में घटना-क्रम के लिहाज से यह यात्रा विपरीत दिशा में चित्रित है। कहानी का शुरुआती दृश्य ही यह इंगित करता है कि वह अब भौतिक-रूप से एक सम्पूर्ण इंसान है क्योंकि उसमें किडनी का प्रत्यारोपण (Transplantation) संपन्न हो गया है। वह अब स्वस्थ है। इसके बाद ही उसका पेशागत पहचान स्पष्ट होता है कि वह दिन-रात सिर्फ पैसों के बारे में सोचने वाला एक स्टॉकब्रोकर है। उसकी नानी समाजसेविका है, जिसके पास वह आज-कल रहता है। एक दुर्घटना में नानी का पैर टूटता है और वह फिर से अस्पताल वाले माहौल में चला जाता है। नानी उसे हमेशा ताना देती है कि फ्रीडम-फाइटर और समाज-सेविका का नाती अमेरिका का पिट्ठू बना बैठा है। लोगों के सामने वह खुद को अपमानित महसूस करता है। इसी बीच पता चलता है कि डॉक्टरों के गिरोह ने एक मजदूर की किडनी चुरा ली है। संयोग ही है कि जिस दिन नवीन को किडनी लगाई गई थी उसी के एक दिन पहले मजदूर की किडनी चोरी हुयी थी और दोनों का ब्लड-ग्रुप भी एक ही है। नवीन को शक होता है कि कहीं वही किडनी उसे नहीं लगाई गई है। यहाँ से नवीन एक नई पहचानगत यात्रा पर निकलता है। शंका का समाधान जल्द ही हो जाता है और पता चलता है कि मजदूर की किडनी स्टॉकहोम, स्वीडन के एक अमीर आदमी को लगाई गई है। नवीन उस आदमी से मिलने स्टॉकहोम जाता है। इन सारे प्रयासों का लब्बोलुआब यह निकला कि रोता हुआ हारा-पीटा मजदूर फिर से हरा हो जाता है। यहाँ फिर वही सवाल कि स्टॉक-ब्रोकर से कार्यकर्ता बनने की इस यात्रा में नवीन ने जो-जो पहचान पाया उनके बीच में क्या संबंध है? कौन सी पहचान नवीन की सम्पूर्ण पहचान है? संकुचित और अनैतिक संसार के निवासी नवीन का यह कायाकल्प भी एक विरोधाभासी गुत्थी ही है।

तात्कालिक स्फुट विचार 1- शिप ऑफ थीसियस एक ऐसी फिल्म है जिसने बॉलीवुड में विद्यमान ‘छवि-समृद्धि के स्टीरियोटाइप’ को तोड़ा है। इस लिहाज से भी यह कुछ अपवाद फिल्मों की श्रेणी में आती है। फिल्म ‘छवि-समृद्धि’ के सबसे आसान तरीके मसलन ‘स्मोक, पिस्टल और सेक्स’ से एक सचेत दूरी बनाती है। यह दूरी और कुछ नहीं बल्कि छवि-अंकन में निष्णात आनंद की एक सचेत रचनात्मक जिम्मेवारी को दिखाता है। जहां आप ‘प्रचलित जनाभिरुचियों’ को सहलाते नहीं हैं बल्कि आप उसे संशोधित-संवर्द्धित और संश्लिष्ट करते हैं। जिसके बाद आपको यह कहने की जरूरत नहीं पड़ती है कि धूम्रपान करने से कर्क रोग होता है या संभोग करने से एड्स होता है।

तात्कालिक स्फुट विचार 2- कला में विचार(Idea) को विचार के रूप में चित्रित करना खतरे से खाली नहीं है। दर्शन का क्षेत्र पहले से ही इसके लिए सुरक्षित है। कला-सिनेमा-साहित्य में विचार को शब्दों-रंगों से रंगना तब-तक सार्थक नहीं कहा जायेगा, जब-तक उसका एक सामाजिक परिप्रेक्ष्य स्पष्ट न हो। आनंद गांधी की फिल्म शिप ऑफ थीसियस  के सन्दर्भ में जो नया विवाद पैदा हुआ है, उसकी समस्या की जड़ मुझे यहीं दिखती है। राइट हियर राइट नाउ, कंटिन्युअम और शिप ऑफ थीसियस देखने के बाद यह कहा जा सकता है कि आनंद का मानना है कि जगत में जो कुछ भी घटता है उसका कोई न कोई लिंक पूरे समाज के साथ जुड़ा होता है और इसी में एक तार्किक सामाजिक सार्थकता भी निहित होती है। यह मान लेने के बाद सम्बद्धता-प्रतिबद्धता का सवाल गौण हो जाता है। मतलब आज हमारा जीना सिर्फ एक विचार का घटित होना भर है। आनंद को इस आइडिया वाले गेम से बाहर निकलना होगा। भरे-पूरे समाज को चित्रित करने के क्रम में घटिया विचार भी परिष्कृत हो जाता है। यह चिंता इसलिए है कि बॉलीवुड में बहुत दिन बाद कोई ‘क्राफ्ट्स मैन’/हुनरमंद निदेशक दिखा है, जरुरत है कि आर्टिस्ट के दर्जे तक कैसे पहुंचा जाये।

1.

किसी फिल्म को लोगों की दृष्टि से बचा ले जाना हो तो उसे आर्ट फिल्म का दर्जा दे दो। शिप ऑफ थीसियस  के संदर्भ में शुरू में ही यह प्रयास दिखा, लेकिन यह सफल होता हुआ नहीं दिख रहा है। क्या आर्ट फिल्म कोई स्पष्ट-परिभाषित पद है? यह अतिप्रचलित पद पता नहीं कब, कैसे और किन फिल्मों के लिए स्थिर हो गया, समझ के परे है। अमेरिका-इंग्लैंड की तर्ज पर यह बॉलीवुड में भी घुस गया। जहां फिल्म-निर्माण एक उद्योग के बतौर स्थापित हुआ, फिल्में सार्वजनिक उपभोग (Mass Consumption) के लिए माल में तब्दील हुयीं। यूरोप में आर्ट फिल्म जैसे पद का प्रचलन नहीं है। क्या इसमें कुछ संकेत छुपे हो सकते हैं? अगर इसे थोड़ा स्पष्ट किया जाय तो ऐसे कहा जा सकता है कि दो तरह की फिल्में होती हैं। एक कंपनी (Producent) की फिल्में होती हैं, दूसरी रचयिता/निर्देशक (Author/Director) की फिल्में होती हैं। दुनिया भर की तमाम क्लासिक फिल्में रचयिता/निर्देशक की फिल्में हैं। शिप ऑफ थीसियस रचयिता/निर्देशक की फिल्म है। किसी कंपनी के हितों को ध्यान में रख कर बनाई गई ‘कमर्शियल फिल्म’ नहीं है। बॉलीवुड और हॉलीवुड में फिल्म को एक कला-माध्यम के रूप में सिर्फ तकनीक और पैसे के संदर्भ में ही देखा-समझा गया है। जिस कला-माध्यम की शुरुआत मैन विद द मूवी कैमरा से हुयी हो, वह कैसे हॉलीवुड और बॉलीवुड में मैन विद द वुमेन, वायलेन्स, स्मोक, सेक्स, पैसा एंड 3डी ग्लासेस हो गया! मैन विद द मूवी कैमरा की परंपरा वाली फिल्मों ने अपनी एक भाषा विकसित की है- दृश्य भाषा (Visual language)। यह भाषा यथार्थ के विवरणों को पकड़ने में बड़ी सहायक हुयी है। फिल्म जैसे दृश्य कला-माध्यम की सबसे बड़ी भूमिका अभी तक कुछ रही है तो वह है यथार्थ के विवरणों को उसकी सम्पूर्ण नग्नता और सुंदरता के साथ सामने ले आना। बेला तार जैसा प्रसिद्ध निर्देशक इसीलिए जाना जाता है। वातावरण की एक-एक हरकत को पकड़ने के लिए वह बहुत समय लेता है, पत्तियाँ अगर टूट कर जमीन पर गिरती हैं तो  हवा चलने के बाद वह फिर से उड़ती भी हैं और इस क्रिया को कैद करने में जितना भी समय लगता है, बेला तार वह समय लेता है। लॉन्ग शॉट/वाइड एंगल के संदर्भ में कैमेरे पर उसकी ऐसी पकड़ दिखती है, मानो एडिटर को बहुत मगज़मारी नहीं करनी पड़ी होगी। कहानी सुनने के आदि हम बॉलीवुड के भावक को यह सब कुछ अजीब लगता है। बेला तार/तारकोव्स्की जैसे निर्देशकों की फिल्मों में वातावरण के विवरणों वाला यथार्थ जैसे ही पर्दे पर दिखता है तो मानो यथार्थ मूर्तिमान हो उठता है और लगता है कि यथार्थ से ज्यादा सुंदर, उदास, हिंसक कुछ हो ही नहीं सकता है। यह वातावरण, जिसमें एक साथ बहुत चीजें घटित हो रही हैं, की बारीकियों को सम्पूर्णता में पकड़ने की कोशिश करना यही एहसास दिलाता है कि दृश्य-श्रव्य कला का इससे बड़ा उत्स कुछ और नहीं हो सकता है और जिसने भी इसे संपूर्णता में पकड़ने की कोशिश की है वह बड़ा कलाकार हुआ है, और साथ ही साथ उस वातावरण में उपस्थित चरित्र (अभिनेता/अभिनेत्री), जो कि लंबे समय तक के लिए सहजता की मांग करता है, की सार्थकता उसके अभिनय-सामर्थ्य से तय होती है। (यह स्थिति प्रयोग-सिनेमा(मणि कौल) के उस प्रस्तावना के विरोध में ठहरती है जहां अभिनय-कौशल को एक बाहरी गुण मानने का आग्रह था।) अकारण नहीं है कि फिल्म-कला के इस पक्ष ने साहित्य को, खासकर कथा-लेखन(Fiction Writing) को ‘बुरी’ तरह प्रभावित किया है। दूर से उदाहरण लेने से अच्छा है कि अपने निर्मल वर्मा को ही देख लिया जाय। उनकी कथा-शैली ऐसी फिल्मों से प्रभावित लगती है। जब वे इस तरह लिखते हैं -‘वह पतझड़ की एक शाम थी। पेड़ों से पत्तियाँ नदारद थीं। आँखों के सामने से कुछ पीली और बहुत सारी सूखी पत्तियाँ उड़ती हुयी चली जाती थीं। पत्तियों की खड़-खड़ से अचानक उसका आत्मचेता मन सचेत होता है और वह सामने से आती हुयी दिखती है।’ शायद असद जैदी ने तो कहीं लिख भी दिया है कि निर्मल वर्मा को पढ़ना ऐसा लगता है मानो आप किसी खराब फिल्म की पटकथा पढ़ रहे हों। क्योंकि यह शैली पर्दे पर ही साक्षात होती है। कथा-लेखन पर इसका असर कितना सही है या कितना गलत है यह बहस का एक अलग विषय हो सकता है। ठीक इसके उलट बॉलीवुड/हॉलीवुड की फिल्मों को कथा-साहित्य ने (पल्प फिक्शन) ने बहुत ही प्रभावित किया है। इस प्रभाव के कारण हम सिनेमा जैसे दृश्य-कला को भी साहित्य के मानदंडों पर ही तौलते रहे हैं और कथानक की बारीकियों को टटोलने में ही अपनी समीक्षक-बुद्धि की इतिश्री समझते रहे हैं। और जहाँ फिल्मों ने कहानियों को प्रभावित किया, वहाँ हम ‘कथानक का ह्रास’ टाइप जुमले फेंक कर उसके विश्लेषण में खुद को न्योछावर करते रहे हैं। शिप ऑफ थीसियस एक ऐसी फिल्म के रूप में हमारे समक्ष चुनौती पेश करती है, जहां से कथा-शिल्प और फिल्म-शिल्प की बहस की शुरुआत हो सकती है। कहानी-कथा के भाषा-शिल्प में बनी फिल्मों की भीड़ में शिप ऑफ थीसियस सिनेमा की भाषा/शैली में तीन कहानियाँ कहती है।

2.

शिप ऑफ थीसियस के अतिप्रचार को भी लोग मुद्दा बना रहे हैं और इसका कारण किरण राव-अमीर खान के समर्थन को बता रहे हैं। यह बात सही है कि किरण राव ने इस फिल्म को एक बड़े प्लेटफॉर्म पर आने का मौका दिया है। लेकिन फिल्म के साथ किरण राव का यह जुड़ाव फिल्म के बन जाने और फिल्मोत्सवों में चर्चा हो जाने के बाद का जुड़ाव है। मैं खुद इस फिल्म की चर्चा कमल स्वरूप जैसे फिल्म निर्देशक से 2 साल पहले से सुनता आ रहा हूँ। कहने का मतलब यह कि किरण राव का इस फिल्म से कोई रचनात्मक जुड़ाव नहीं है। आनंद गांधी का कितना नाम हो रहा है, इससे पहले यह भी देख लेना चाहिए कि एक अच्छी फिल्म से जुड़ने के कारण किरण राव का भी नाम हो रहा है कि नहीं! यहाँ सारे जुड़ाव का मूल स्रोत है शिप ऑफ थीसियस । अगर किरण राव में इतनी क्षमता है कि वे किसी फिल्म को अतिप्रचारित (बौद्धिक खेमों में) करवा सकती हैं, तब तो धोबी घाट को भी वही परिणाम मिलना चाहिए था जो शिप ऑफ थीसियस को मिल रहा है!!

शिप ऑफ थीसियस को सिनेमाघर में लगे अभी एक सप्ताह हुये ही थे कि उसकी पहली कहानी पर आइडिया को चोरी करने का आरोप लगने लगा। पहली कहानी को रंग से महरूम (Bereft Of Colours) नामक एक डिप्लोमा शॉर्ट फिल्म से प्रेरित बताया गया। आनंद इस आरोप को सिरे से नकारते हैं। मैंने भी इस डिप्लोमा फिल्म को देखा और पाया कि पहली कहानी और डिप्लोमा फिल्म में विचार के शुरुआती स्तर पर कुछ समानताएँ हैं। लेकिन दोनों फिल्मों के निष्कर्ष अलग-अलग हैं। अगर विचार की समानता को किनारे रख दें तो इसमें किसी को शक नहीं है कि आनंद की फिल्म डिप्लोमा फिल्म की तुलना में ज्यादा सुंदर/समृद्ध, यथार्थवादी और आगे बढ़ा हुआ कदम है। जैसे पिकासो का वह महत्वपूर्ण चित्र जिसे हम कोरिया में जनसंहार (Massacre in Korea) नाम से जानते हैं, साथ ही साथ लोग यह भी जानते हैं कि यह चित्र फ्रांसिस्को डि गोया  के चित्र तीन मई, 1808 (1814) से प्रभावित है। पूरा का पूरा कम्पोजीशन फ्रांसिस्को डि गोया से उठाया गया है लेकिन पिकासो ने उस फ्रेम को/ कम्पोजीशन को एकदम से एक तीव्रता के साथ समकालीन बना दिया। आनंद गांधी अगर अनजाने में भी उस डिप्लोमा से कुछ लिए होंगे तो भी शिप ऑफ थीसियस की पहली कहानी की कोई भी तुलना (समानधर्मा के सेंस में) डिप्लोमा फिल्म से संभव नहीं है; क्योंकि दोनों फिल्म की अंतश्चेतना में एक तरह का विलगाव है। घटना-स्तर की समानता को ही अगर हम कला में चोरी का मामला बनाते हैं तो परंपरा में संवर्द्धन की गुंजाइश वाली स्थिति से छुटकारा पा लेना होगा। तुर्गनेव ने कहा था कि हमलोग (कहानी लेखक) गोगोल के ओवरकोट से निकले हैं। तुर्गनेव के कहने का साफ संकेत था कि हमारी कहानियों में गोगोल की परंपरा जगमगाती है। परंपरा का एक-एक पड़ाव कलाकृति में दीपदिपाता है और यह सब इसलिए भी होता है कि हर कलाकृति अपने आदिम-रूपों को पाने के लिए लालायित रहती है। इन मानकों के आस-पास जो भी कृति अपनी जगह बनाने में सफल होती है उन्हें हम क्लासिक का दर्जा देते हैं। ऐसी फिल्मों को हम लेखक-निर्देशक की फिल्में कहकर कंपनियों की फिल्मों से अलगाते हैं। किसी भी अच्छी फिल्म/क्लासिक फिल्म की जब हम चर्चा करते हैं तो सुधी समीक्षक सबसे पहले उसमें उसी परंपरा की खोज करते हैं। परंपरा से लेते हुये क्या तोड़ा, क्या जोड़ा, या और कुछ नहीं तो परंपरा का निर्वहन ही किया कि नहीं! इस निर्वहन पर भी लोग आरोप लगा सकते हैं कि निर्देशक ने कहाँ-कहाँ से माल टीपा है। अगर, मैं संवेदनशीलता के तकाजे को भूल जाऊँ तो कह ही सकता हूँ कि शिप ऑफ थीसियस वातावरण के नैराश्य को चित्रित करने के लिए तारकोव्स्की के कैमेरे का इस्तेमाल करता है। दो या तीन जगह आपको साफ-साफ दिखेगा कि दृश्य तारकोव्स्की की फिल्म स्टॉकर (1979) से प्रभावित हैं और मिरर (1975) का वह प्रसिद्ध धान का खेत भी यहाँ मौजूद है। शहरी संरचना को एक सांस्कृतिक बिम्ब के रूप में चित्रित करते समय आनंद गांधी के यहाँ क्रिस्टोफ़ किसलोवस्की भी मौजूद हैं। इसी तरह एक धार्मिक/आध्यात्मिक व्यक्तित्व की दुनिया या उसकी ऊंचाई को दिखाता हुआ अलेखान्द्रो जोदोरोवस्की के होली माउंटेन का रेड टावर भी एक जगह दिखता है। बेला तार भी अपने लॉन्ग शॉट और वाइड एंगल के साथ हैं। आर्टिस्ट (2011) का भी स्पर्श दिख सकता है, पहली कहानी में इस स्पर्श को लोग अनुभव कर सकते हैं। आर्टिस्ट में लोग गूंगे थे, इसलिए इशारों में बात करते थे। तकनीकी साधनों के विकास/आविष्कार ने जब लोगों को जुबान और कान दे दी तो मुख्य पात्र ने जीना स्थगित कर दिया क्योंकि बाकी लोग कहने-सुनने के अभ्यास में व्यस्त हो गए। मुख्य पात्र इस नए आविष्कार के साथ सहज नहीं हो पा रहा था और खुद को समाप्त कर देना ही बेहतर समझा। और विजय आनंद की गाइड(1965) तो है ही। हालांकि, आनंद गांधी का कहना है कि उन्होंने गाइड नहीं देखी है और इसे नहीं मानने का कोई कारण नहीं है। परंपरा का अनुभव/असर कोई प्रत्यक्ष क्रिया नहीं है। फिल्म-निर्माण की प्रक्रिया में यह अनुभव एक सामूहिक अनुभव हो जाता है, जिसके अंत में यह निर्दिष्ट करना भी संभव नहीं होता कि कौन सा असर कहाँ से आया है और यह तब तक चलेगा जब तक वह एक सामूहिक रचना-कर्म बना रहेगा। इन तमाम प्रभावों को उस यात्रा की तरह ही मानता हूँ जहां हर कला-कृति अपने आदिम रूप को पाना चाहती है।उस आदिम रूप को पाने के लिए उसकी एक यात्रा पीछे की तरफ होती है, जिसमें परंपरा के महत्वपूर्ण पड़ाव जगमगाते से दिखते हैं।

यह असर फिल्म का असर नहीं होकर परंपरा का असर है और गाइड का असर साफ-साफ दिखता है। मसलन जब मैत्रेय का एक साथी साधु कहता है –“और आपके गुरु जी बोस्टन में हैं। वो भी हमारे सप्रिय मैत्रेय की तरह साधु कम और शास्त्री ज्यादा हैं। चलो अँग्रेजी बोलने का कुछ तो फायदा हुआ।” याद करें, गाइड का वह दृश्य जहां साधु-पंडित बने राजू और परंपरागत पंडित-पुजारियों के बीच शास्त्रार्थ होता है। परंपरागत पंडित-पुरोहितों द्वारा संस्कृत में पूछे गए सवाल से राजू अवाक रह जाता है, तब पुरोहित लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं कि ‘संस्कृत आती हो तब न’। इसके बाद राजू उनसे अँग्रेजी में सवाल करता है, तो पंडित-पुरोहित अवाक हो जाते हैं, फिर राजू उनका मज़ाक उड़ता है- ‘अँग्रेजी आती हो तब न!!’  दूसरा दृश्य, अन्न-त्याग के बाद जब राजू मरणासन्न है जहां लोगों का मेला लगा हुआ है। अन्न-त्याग के बाद मरणासन्न स्थिति में पहुँचे मैत्रेय के आस-पास वही दृश्य अपने लघु-रूप में मौजूद है। लेकिन इन सब प्रभावों के बावजूद शिप ऑफ थीसियस  आनंद गांधी की फिल्म है, एक निर्देशक-लेखक की फिल्म है क्योंकि अपने निष्कर्षों में यह गाइड से अलग है और यह निष्कर्ष ही आनंद का वैचारिक प्रस्थान है। गाइड में दया-दर्शन का पात्र बना राजू मर जाता है क्योंकि उसे एक विश्वास/आस्था को कायम रखवाना था इसे वह नैतिक जिम्मेवारी की तरह ढोता है लोगों के अंदर से यह आस्था भी अगर खत्म हो जाएगी तो उनकी मानवीय जिजीविषा दम तोड़ देगी। शिप ऑफ थीसियस के मैत्रेय के सत्य-प्रयोग में खुद की जिजीविषा आड़े आ जाती है और जीने का तर्क हावी हो जाता है। भावना पर तर्क की जीत जैसा कुछ। क्योंकि एक जगह मैत्रेय खुद कहता है- “Just cut down the sentimentality a bit. We must address people’s reason more.”

3.

फिल्म-आलोचना, साहित्य-आलोचना एक तरह की संवेदना की मांग करती है। 1980 में जन्मे आनंद गांधी 19 साल की उम्र से ही फिल्मों-धारावाहिकों के लिए लिख रहे हैं। 14 साल की उम्र से ही संस्थागत ज्ञान-अध्ययन क्षेत्र को अलविदा कहकर स्वाध्याय और गुणी-ज्ञानी के संगत में चले जाते हैं। हिन्दुस्तानी-परंपरा के दार्शनिक सवालों से लेकर पश्चिम तक के दार्शनिक गुत्थियों से जूझते रहे हैं, और यह दार्शनिक गुत्थी अपने ‘बालकोचित प्रयासों’ के साथ उनकी सारी फिल्मों में मौजूद रही है। 32 साल की उम्र में शायद ही किसी भारतीय निदेशक ने ऐसा नाम कमाया हो, जैसा आनंद गांधी ने शिप ऑफ थीसियस को बनाते ही हासिल किया है। शिप ऑफ थीसियस को देखते हुये इतना जरूर महसूस होता है कि यह कला के उस दायरे फिल्म है जहां बालकोचित जिज्ञासा सी सरलता और ‘अबोधता’ एक प्राथमिक मांग होती है और आनंद गांधी उस मांग को पूरा करते हैं। आनंद अपने वक्तव्यों में जितने ज्ञानी-मुनि ध्वनित होते हैं, शिप ऑफ थीसियस  में उतने ही मासूम दिखते हैं। उन्हें यह भलीभाँति पता है कि उनकी कहानियों का उत्स कुछ दार्शनिक सवाल हैं लेकिन वे कह कहानी ही रहे हैं और यही रचनात्मक ईमानदारी उन्हें ग्राह्य बनाता है। नहीं तो, प्रयोग-सिनेमा की तरह सतह से उठते देर नहीं लगता आनंद गांधी को। जहां ‘बौद्धिक-प्रलाप’ कहानी की सतह पर ही बजबजाने लगता है, और टेक्स्ट के मूल स्रोत को भी सशंकित कर देता है। आधुनिक रचना-प्रक्रिया का यह स्वाभाविक क्रम रहा है- विचार<थीम<कहानी। शिप ऑफ थीसियस अगर इसी रचना-प्रक्रिया को उदाहृत करता है तो क्या गलत करता है? यह सवाल जरूर वाजिब है कि जिन दार्शनिक गुत्थियों को वह सुलझाने के लिए कहानियाँ कहता है, क्या वह उन गुत्थियों को या उनकी प्रासंगिकता को सार्थक करता है? और कुछ लोगों का मानना है कि वह सार्थक नहीं करता है। क्या इसी से फिल्म या किसी भी कला-रूप को हम खारिज कर सकते हैं?

4.

अब जरा तीनों कहानियों का जायजा लें जिनसे शिप ऑफ थीसियस बनता है या शिप ऑफ थीसियस नामक विरोधाभासी गुत्थी को बखानने के क्रम में जो तीन कहानियाँ कही गई हैं। इस पर थोड़ा सोचने की गुंजाइश श्रद्धेय आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने पैदा कर दी है,  फिल्म देखने के तत्काल बाद फ़ेसबुक के अपने वाल पर उन्होंने प्रतिक्रिया दी “…the film makes a case for organ donation, a very noble thing to do in itself….” क्या सचमुच फिल्म सिर्फ यही कहती है? मुझे लगता है यह स्थितियों के सरलीकरण के अलावा और कुछ नहीं है। तीनों कहानियों में अंगदान के अलावा भी कुछ शानदार चीजें साझा हैं। अंगदान कितना भी महान हो लेकिन वह सिर्फ घटना है। इन तीनों कहानियों में मुझे जो शानदार लगी और साथ ही साथ जो तीनों कहानियों में साझा की गई है, उसका संबंध एक विचार से भी है। वह विचार यह है कि मानसिक रूप से हम अपने समाज के हिस्से नहीं हैं। ऐसे में हमारा अस्तित्व हमेशा दूसरे के मुक़ाबले तय होता है या पहचान पाता है। उस दूसरे से, जिससे हम सार्थक होना चाहते हैं, भौतिक रूप से एक अन्यता (otherness) का संबंध होता है। यही अन्यता मानसिक रूप से अपने समाज-वर्ग-जाति-लिंग-पेशा आदि के संबंध में द्रष्टव्य होता है। भौतिक और मानसिक अन्यता का यह भाव और स्थिति परस्थितियों को विडंबनात्मक बनाती है, जिससे कहानी में contrast पैदा होता है। पहली कहानी की नेत्रहीन फॉटोग्राफर आलिया के संसार में न तो कोई दूसरा फोटोग्राफर है और न ही कोई नेत्रहीन। वह अक्सर आँख वालों की दुनिया से प्रशंसित होती है, एक गैर पेशेवर दुनिया की ओर मुखातिब रहती है। इस भौतिक अन्यता को वह मानसिक अन्यता में भी बरकरार रखना चाहती है। अपने पुरुष दोस्त से उसकी हर तकरार इसी ओर इशारा करती है। जैसे ही आँख वाली दुनिया में वह आँख के साथ शामिल होती है उसकी भौतिक अन्यता समाप्त हो जाती है और यही उसके लिए बेचैनी का सबब है।

जिस सांसारिक मोह-माया से उबरने के लिए मैत्रेय के मंडली के लोगों ने भिक्षुक होना स्वीकार किया, मैत्रेय को छोड़कर सभी लोग वापस उसी माया-मोह में फँसते दिखते हैं। लोग ज्यादा खाने के कारण या ज्यादा खाने के लिए दवाइयाँ खाते हैं। भक्तजनों से ज्यादा सेवा-भाव के लोलुप दिखते हैं। इन तमाम प्रयासों के बावजूद उनके लिए एक सात्विक भाव लिए कोई भक्तमंडली नहीं दिखती है, दिखती भी है तो कुछ ‘घरेलू महिलाओं’ की एक भीड़। मैत्रेय इन साधुओं से एकदम अलग दिखता है। बिना किसी आग्रह-भाव के इनके आस-पास पढ़े-लिखे संभ्रांत से दिखते भक्तों की एक जमात है। जिसमें युवा भी हैं और बुड्ढे भी। डॉक्टर हैं तो वकील भी हैं। यही संभ्रांत सांसारिक तबका उनकी बातों को तवज्जो देता है। पढ़ने लिखने की सामाग्री मुहैया करता है। यहाँ भी दिखता है कि मैत्रेय अपने साधु-जमात से मानसिक रूप से असंपृक्त है, लेकिन भौतिक रूप से उसी समाज का हिस्सा है। इस मानसिक असंपृक्ति को वह संभ्रांत सांसारिक भक्तों के बीच घुलाना चाहता है। यहाँ वह एक तरह का मानसिक लगाव अनुभव करता है। लेकिन इस तरह का मानसिक लगाव कुछ बलिदान भी मांगता है, इसी वेदी पर गाइड के राजू जी को अपनी बलि देनी पड़ी थी।

और अंत में, तीसरी कहानी का नवीन, एक स्टॉक ब्रोकर, शेयर बाज़ार का दलाल, पैसों का लालची। नानी के बहाने समाजसेवियों की जमात में गिर पड़ा है। इस कहानी में आप कह सकते हैं कि नवीन की स्थिति अन्य कहानियों की तुलना में स्वाभाविक नहीं है बल्कि परिस्थितिजन्य है। नवीन के भीतर होने वाले बदलाव को हम देख सकते हैं। यहाँ भी शेयर बाज़ार वाले उसके  संगी-साथी या उनका भरा-पूरा समाज नहीं दिखता है। नवीन के भीतर हुये बदलाव और नानी की संगत ने पहले से विद्यमान मानसिक अन्यता को तीव्रता प्रदान कर दी है। इस तीव्रता के कारण वह मानसिक रूप से अब नानी से संपृक्त महसूस करने लगा है। इस कहानी में पूर्व की दोनों कहानियों की निरंतरता के तत्व की तुलना में विलोम-तत्व(antithesis) ज्यादा प्रभावशाली हैं, ऐसा मुझे लगता है। शुरुआती दोनों कहानियों के पात्रों का यात्रा-क्रम अभावात्मक हैं। भौतिक अभाव पर जीत रचनात्मक और नैतिक अभाव का कारण बनता है। भौतिक अभाव से रचनात्मक और नैतिक अभाव की यात्रा। दूसरे तरीके से कहें तो रचनात्मक-नैतिक समृद्धि से ‘रचनात्मक-नैतिक ह्रास’ की यात्रा। आलिया और मैत्रेय की यात्रा एक ही मायने में सार्थक है कि वे शारीरिक (भौतिक) पूर्णता को पाते हैं, लेकिन यह उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व नहीं बनाता है। नवीन की यात्रा में अभावात्मक स्थिति जैसा कुछ नहीं है। वह एक साथ शारीरिक-सामाजिक-सांस्कृतिक सभी तरह की समृद्धि की ओर अग्रसर है। तीसरी कहानी में सामाजिक परिप्रेक्ष्य का दायरा अन्य दोनों कहानियों के बनिस्पत ज्यादा बड़ा और स्पष्ट है। घटनाओं के जमघट वाला भरा-पूरा संसार और यही वह कारण है कि यह कहानी पूर्व की दोनों कहानियों का विलोम सा लगता है; लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह कहानी कोई निरंतरता भंग करती है क्योंकि तीनों में परिवर्तन, परिवर्तन का परिणाम और परिवर्तन के कारण जैसे सवाल कहीं न कहीं विरोधवासी स्थितियों में डालता है।

5.

फिल्म की तीनों कहानियों को जोड़ने वाला भौतिक सूत्र वह आदमी है जिसने आठ लोगों को जीवन-प्रदान किया है। उसी एक आदमी के आँख, लिवर और किडनी क्रमशः आलिया, मैत्रेय और नवीन को लगाया गया है। इस बिना पर भी यह सिर्फ अंगदान की कहानी नहीं रह जाएगी? क्योंकि यहाँ भी एक विरोधाभास खड़ा होता है कि उस आदमी के अंग, जो अन्य आठ लोगों को लगाया गया है, अन्य लाभार्थियों में लग कर क्या अपने पुराने पहचान से पृथक हो गए हैं या उन्हें नया पहचान मिल गया है? यहाँ भी एक विरोधाभास है। अगर इस फिल्म को सिर्फ अंगदान की कहानी होना होता तो कम से कम उसे पाँच और कहानियाँ कहनी पड़ती। उस महादानी की भी एक कहानी है जो स्वयं फिल्म में साक्षात नहीं है, वैसे ही जैसे फिल्म का निर्देशक भी साक्षात नहीं होता है। वह एक अंधेरे खोह में, जो कभी-कभी बीहड़ का भी आभास दिलाता है, हेडटॉर्च लिए कुछ खोज रहा है। यह खोह या गुफा प्लेटो के के गुफा जैसा भी नहीं है। जहां लोगों का एक समूह है। समूह जंजीर से (अमिताभ वाला जंजीर भी हो सकता है) बंधा है। उन्हें पीछे देखने की इजाज़त नहीं है जबकि प्रकाश-स्रोत उनके पीछे ही है लेकिन वे उसे देख नहीं पा रहे हैं। वे प्रकाश के उद्गम से अंजान अपनी छायाओं को दीवाल पर देखते हैं और उन्हें ही यथार्थ समझ बैठे हैं। इस खोह में वह दानी व्यक्ति अकेला है प्रकाश-स्रोत को खुद ललाट में बांध रखा है और अपनी छाया को साथ लिए आगे बढ़ता जा रहा है। उसने क्या अनुभूत किया यह बताने के लिए वह हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसके हाथ में एक कैमरा था और वह अपनी गति-दिशा और गंतव्य के रास्ते को रिकॉर्ड करता जा रहा था। उसने गंतव्य को पाया कि नहीं यह भी हमें मालूम नहीं है। हम सिर्फ उस ‘लक्ष्य’ को पाने की प्रक्रिया से वाकिफ हैं और वह प्रक्रिया इतनी समृद्ध है कि हम उस अधूरी यात्रा को भी उसकी  सचेत और गंभीर संलग्नता के बतौर संज्ञान में लेने को तत्पर हैं। हर ‘सफल यात्रा’ कुछ संज्ञाएँ देकर समाप्त हो जाती है, फिर संज्ञाओं की यात्रा शुरू होती है, मसलन कुछ आविष्कार, कुछ दवाइयाँ, कुछ स्थान और कुछ ‘ज्ञान’ भी। और, हर असफल यात्रा बहुत सारी कहानियाँ देकर हमें भी खुद में साझा कर लेती है, वह हमारे भावनात्मक संसार में एक थाती बनकर बस जाती है। हम सारी कहानियों को समेटने में सफल नहीं हो सकते हैं, क्योंकि वे हमारी क्षमताओं और उम्र के पार होती हैं। बहुत सारी कहानियाँ ऐसी भी होती हैं जो अनकही रह जाती हैं। किसी एक फिल्म में उन सारी कहानियों को समेटना संभव भी नहीं था। शिप ऑफ थीसियस उन्हीं कहानियों में से तीन कहानी को हमारे सामने लाती है और बॉलीवुडीय सिने-अनुभव में एक थाती के रूप में सँजोये जाने वाली फिल्म के रूप में स्थिर/सुरक्षित हो जाती है। कहीं इस फिल्म की एक समीक्षा पढ़ रहा था जिसमें समीक्षक ने यह इच्छा जाहिर की थी कि वह फिल्म के हिन्दी subtitle के लिए खुद को बिना पारिश्रमिक प्रस्तुत करना चाहता है ताकि वह अपनी माँ को यह फिल्म दिखा सके। मेरी माँ न हिन्दी जानती है और न ही अँग्रेजी फिर भी मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि किसी भी बॉलीवुडीय फिल्म से ज्यादा बढ़िया तरीके से वह इस फिल्म को समझ सकती है। क्योंकि, इसकी एक यात्रा पीछे की ओर भी है। जहां वह फिल्म-कला के आदिम रूप को पाने की कोशिश करती है। शिप ऑफ थीसियस की इस यात्रा से उड़ने वाले धूल-कण से निकलने वाली कौंध ने लोगों को कम से कम एक बार आँख मींचने के लिए मजबूर तो कर ही दिया है। दूसरी तरह कहना हो तो जैसे कुमार गंधर्व का कोई गीत आईपॉड में लगाकर उसका ईयरफोन ‘फिल्मी गाने’ के किसी श्रोता के कान में चुपके से ठूंस दिया गया हो।

इति

(इस समीक्षा को लिखवा लिए जाने के लिए अपने अन्यतम मित्र संजय सहाय जी का आभारी हूँ…मित्र रवीश चौधरी से हुयी बात-चीत से बहुत कुछ हासिल किया हूँ और इस लेख में भी बहुलांश इस्तेमाल करने की कोशिश किया हूँ, रवीश जी का भी आभार। )
 उदय शंकर

उदय शंकर

जेएनयू से पीएचडी के लिए शोधरत। तीन खंडों में आलोचक सुरेंद्र चौधरी के रचना संचयन का संपादन। सांस्‍कृतिक आंदोलनों से जुड़ाव। उनसे udayshankar151@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

Tzameti: A Thriller about Thrill: Gazala Meena

 13 Tzameti is an acclaimed and highly talked over  film. This film occupies first position in the list of  Director Anurag Kashyap’s top ten favourite films. Anurag has requested all to watch this great cinema work before dying. Gazala has written this analytical commentary on 13 Tzameti for Tirchispelling.

By Gazala Meena

A thriller about thrill Tzameti (13), the directorial debut of Gela Babluani, spins our senses through lethal rounds of Russian Roulette leaving the irony of chance and the perversion of pleasure to unfold. The narrative, at the onset, engages with desperation; the desperation of a Georgian immigrant Sebastein living in France, who is struggling to make ends meet doing irregular construction jobs and the desperation of Godon, Sebastein’s temporary employer, a morphine addict whose monetary savings are on the verge of exhaustion. While, Sebastein’s immediate dependence is on the payment from Godon; Godon hopes to make a large sum of money by doing something which he defines as “It worked last time. That was last time”. However, Godon is unsure whether the opportunity to do that ‘something’ will come by or not. This ‘something’, an apparent mysterious job is what gives motion and suspense to the narrative involving games; the game of chase and the game of chance (gambling). With Godon dead due to an overdose, an anxious Sebastein steals the letter concerning the mysterious job which is also of immense interest to the police authorities. Following the leads from the letter an oblivious Sebastein embarks on an unknown quest for sudden riches, dodging the authorities on the way. On his arrival to the destination Sebastien, is no longer Sebastein, he is Tzameti, the Georgian word for 13; a number not a living being. To his utter horror the mysterious job unravels as a deadly game of Russian Roullette where expensive bets are placed on and placed by men. A shaken 13 realizing that he is on a one way track, lines up in a circle with other numbers, most of whom are on a high dose of morphine to be able to withstand what is being asked of them, that is, to shoot or get shot; on a stage like setting, a platform walled on three sides, as the audience wait for the bulb to light and the shots to be fired. Between pointing a gun to someone’s head and a gun pointed to one’s own head the players grapple with conflicting emotions: the ethical question of killing someone and the fear of being killed. It’s all a matter of a few minutes before the moment comes when one’s own life and the other’s is not in one’s hand. It all is a matter of chance, luck and fate as the cylinders with bullets less than their capacity are spun and shots are fired. Multiple rounds are played before the unlucky numbers fall to the ground with bloodied heads and the lucky number becomes the sole survivor, disillusioned on what to react to: winning the gamble, having killed people or just being alive. Irony is underlined as 13, which for irrational reasons is considered an unlucky number, turns out to be the lucky sole survivor, however, in the end becomes a victim of greed and is shot and left to die on a moving train.

The director skilfully creates a cold, dark, grim and real world in minimalist fashion and manages to dramatize malicious thrill and helplessness in a contained manner. Throughout the film, the director keeps the camera close to the actors, primarily using close up, medium close up and extreme close up, because it is the actor’s bodies where action takes place. The viewer is put in close proximity of the actors so that he/she is forced to read the gestures and feel the emotional fluctuations. Crafted in black and white this film goes beyond the anticipation, anxiety, adrenaline rush, forcing the viewer to the edge of one’s seat; it compels the viewer to acknowledge the irony of chance, question the nature of entertainment and the mocking limitation of choices and above all forces the viewers to reflect upon the cruel culture of gambling. The quintessential element of this film is its black and white colour which symbolizes a dichotomy. The dichotomy between win and loss, life and death, owner and owned, choice and no choice, “haves” and “have-not”,  thrill seeker and thrill giver, pleasure and pain so on and so forth. Tzameti situates this dichotomy within the context of entertainment, a particular kind involving a game of chance (gambling) which is bloody and brutal in nature.

13 Tzameti (2005)

13 Tzameti (2005)

Gambling on blood sports, like horse racing, dog fights, cock fights, bull fights, and gladiatorial combats has been going on since time immemorial. While, tracing the nature of gambling during various historical periods with their specific social, political and economic structures; the similarity between the outcome, volition and choice of the actors and the similarity between the audience (gamblers/bettors) becomes evident. In slave societies a slave was the personal property of the property owning class (ruler, nobility) and was coerced to participate in gladiatorial bouts; he had no will (he had to play even if he did not want to), neither did he have a choice (he had to kill to stay alive) and the outcome was either life or death. And this cycle would continue until the slave dies. Under feudalism a serf though not the personal property of the property owning class (ruler, nobility, landlords) was ultimately tied to their property for livelihood. A disproportional economic system co-opted the serf into gambling games leaving him with no will and no choice, while the outcome for him was either death or life with temporary and limited material gains. In a capitalist society emerged an unequal economic system which thrives on the exploitation of labour of the working class by the class that owns the means of production. Possessing nothing but their labour (life), the existence of the working class is reduced to the one of instability and uncertainty which propels them into being pawns in a game, without any will or choice, the pleasure of which is the prerogative of the elite few. While the outcome that these pawns are left with is similar to their historical antecedents, that is, either death or temporary and limited material gains. However, this outcome is less a matter of one’s fate, rather it is rooted in the fate designed for them by the existing economic realities.

Tzameti delves into the dynamics of a deadly game of gambling in a capitalist society, where there are two classes of players involved. One is the active participant who plays for his life; and the other, the passive participant who puts enormous amount of money at stake while, playing for the experience of a vulgar thrill. One participates as the actor/entertainer and the other as the audience/entertained. While, one group struggles with ethical questions, mental and emotional trauma and fear of death; the other group’s senses are tickled with the perverse revelry induced by the performance: a performance in which fear and guilt simultaneously dance on ghostly faces to the bone chilling music of rotating cylinders and deafening bang of gun shots and the stage turns red with blood vomiting bodies and faces turn white of those still standing frozen. While one group has nothing to gain (except the so called lucky one who wins an amount of money which comes with an expiry date) but their lives to lose; the other group has money to win/ money to lose; but above all a sadistic pleasure to relish. The film ends with the lead actor, Sebastein, after being shot somehow manages to sit on a window side seat of a moving train, which it seems is taking him to his death. The moving train is symbolic of a cruel system which moves on even with the burden of dead bodies.

 “Gambling is the son of avarice and the father of despair”

 

Gazala Meena

Gazala Meena

Ghazala Meena is a PHD research scholar in School of International Studies in JNU, New Delhi. She is currently residing in  Japan for her research work.

Cultural Class Always Looks for the Fantasies of Sacrifice, Failure and Suffering- Kamal Swaroop

 By Kamal Swaroop

( A Genius film director and scholar )

An Interview

Why has Kamal Swaroop become the symbol of mistaken genius; a case study in an artist’s tragedy?

If I was competitive and rich I would not have been framed as a genius: rest, cultural class always looks for the fantasies of sacrifice and failure and suffering. Maybe I was available as a subject of their anthropological imagery. Even when I was in FTII, every one called me genius without a solid reason to back that claim up. I never wanted to make a film, but I would talk a lot and reject most films. People challenged me, thus, to make a film myself. Om Dar B Dar was my response. 300187_112406218871243_1609427079_n

What do you identify yourself as? An example to avoid, an obsessive compulsive auteur who held dear his personal vision the most and paid the price for it, or just another film lover?

One of the ex students from the FTII direction course. I can only do what I can do. In art you can’t adopt some one else’s example, you can only represent where you come from. Om dar b Dar is Ajmer. As for being an example to avoid, I would just say – each for himself and cinema against all. I have had a terribly joyous and unframed life.

Is the oblivion a self-imposed exile or are you a victim of circumstances – of being cursed with the gift of being way ahead of your time?

(The irony is) I never fancied myself as a film maker. And feel very happy with the small work I do on mini dv or a multimedia project on Phalke. I also work on other people’s projects. Yes, I accept that I was good in whatever I did. If I was young in today’s time I would have been counted amongst the nerds.

What, according to you, is cinema? What does it constitute in its most original conception?

Resurrection: Individual as in Christ, mass as in the story of Bhagirathy, mass resurrection of children of King Sagar.

Most of the modern-day imagery, such as the one that features in advertisements or even in Bollywood films, basically attempts to and successfully does bypass the logical faculty of the viewers who watch them – addressing, instead, only the most primal, basal and fundamental of the human psyche. Why do you think images around us are getting increasingly redundant?

Most of the best brains from arts and craft are involved in the business of advertising and entertainment industry using the best available technology. They work according to the marketing briefs, i.e each spiritual problem has a material solution. We cannot really expect a philosophical rendering of a subject from them.

Why, looking at the examples of someone like you, or Kumar Shahani, should a new-young filmmaker in this nation pick up his camera and believe that he can actually make it his pen and each film a personal diary entry? What should motivate him towards the attainment of such a personal goal?

Recording and documenting is an important function of cinema, or say storing, like they say stories as means of storing a mass of information. Or say iconography, a constructed representation of vast memory and events. Otherwise it is impossible to store this chaos as it is because of a lack of space. I would not compare camera with pen and paper simile since language has its own reality. But I do agree that there are many young people from NID or Srishti, going back to their home towns and making wonderful things. A decentralization of production is necessary. Otherwise Bombay Bandra home videos are being touted as pan Indian reality.

But again, pen and paper thing applies only to digital video, it would not apply to films that are industrially produced: That film is a result of coming together of many evolved skills and imagination and pushing the technology to its limit. We also have to consider the changing nature of exhibition and distribution, with coming up of smaller states, there is going to be a great need of film makers to represent and to fulfil the artistic needs of that time and space.

There are many young film makers coming out of NID, some from FTII who are returning to their roots and their cities, who do not feel the need to keep imaging Bombay. Like Akash Gaur’s Itni Door Bhagaya, Bela Negi’s Daayen ya Baayen or Ram’s Putaani Party. But to be like a chronicler of a place like the novelist in the older times, it would need a deeper commitment and the local development of the infrastructure. Like in the early 20th Century, the writers had the whole press and distribution system. But at the same time, the demand from the author is not an exclusive subjectivity but a responsibility towards a certain objectiveness towards the people and their history.

Why do you think Parallel Cinema ended of all a sudden, much like Arthur C.Clarke’s Rama? Did it achieve the aims it set out to accomplish? Was it effective, or did it run, as is suggested, only ‘parallel’ to the mainstream, thus never attempting to influence the mainstream aesthetic in any manner? Did it exhaust its own possibilities? How important do you think was NFDC’s role in it?

Parallel cinema was an extension of the literary movement that took place during the 60’s and these writers also dreamt of a certain kind of a cinema and they facilitated the new film makers of that time. At the same time, the Times of India and also other, vernacular literary magazines were in full support of this new happening where the film maker was not just a merchant of entertainment but could be bracketed amongst the artists, ie writers, painters, sculptors. There was already a space for an author like this, in cinema. Realising available space like this, some of the FTII and other people with the unexpected arrival of FFC funding, jumped in. Among these authors, different positions were taken. We didn’t only have Mani Kaul or Kumar Shahani who saw their role and position amongst the international authors, we had people like Basu Chatterjee also who took the middle path and took it also as a business activity. He inspired so many film makers from the industry that he was easily taken in the mainstream. When the industry people realized that a person like KK Mahajan   ­or AK Bir could take 75 shots in a day, the functioning of the industry changed overnight. Even the BR Chopras were inviting Basu Chatterjee to take over. So it is true that the parallel film people influenced the mainstream in a way. Then came the closing down of the TOI publications, like Saarika, Madhuri, Dharamyug, and a lot of other vernacular magazines, who were the mouthpiece of this parallel movement. Earlier these magazines were inspiring the imaginations of the readers and inspiring them to become film makers.

There was a production of these films upto a time, but there were no distribution and exhibition developed parallel with the production activity. Most of the films functioned as a cultural commodity for exchange with the European countries. This cultural commodification started creating new limitations and parameters- formulas within these films. But surprisingly the new generation today keeps looking for NFDC films.

You were a FTII graduate. You resumed your studies as a post-graduate. While you assisted in Attenborough’s Gandhi, where do you think the seeds of your largely formalist approach towards cinema were sown? How important do you think was the role of your vast reading of Indian literature in it?

My thinking changed after watching My American Uncle by Resnais. I was always an anti illusionist and wanted to do something about imagination and education. Or fictionalize philosophical essays. In his this film and his later films, I found a way.

Reading literature, it did help. I connected with Manohar Shyam Joshi’s sense of humour.

What defines the term avant-garde for you? And if can consciously appreciate its connotation, was Om Dar Ba Dar a conscious attempt at that type(avant-garde) of a film?

Avante garde is a technical term applied to a different movement. In Om Dar b Dar, I was reacting to the parallel cinema of that time. For example, I won’t say there are characters. I will say the film itself is a character. I was more interested in disconnecting and making the film that would work like a head cleaner. We used to call it brooming and presumed the role of a scavenger. And constructed a film based on the rejected.jay_filmclub-panel03_02

Is Om Dar Ba Dar an event that you look back at with pride? Or do you look at it as an opportunity lost? Do you ever think you could have made a debut feature that evoked more embracement than intimidation?

Yes, with full pride. And no, I don’t.

You worked with ISRO in helping them produce Science Educational Programmes in the mid 1970s. A lot of Om Dar Ba Dar deals with a person’s simultaneous fascination with science, for instance the moon landing; and bewilderment with it – Om in his science class as he dissects frogs. Is that incorporation autobiographical? How instrumental was your work on the science educational programmes in shaping you as a filmmaker?

During ISRO times, we used to make science programmes based on the Russian books where they used to explain scientific phenomenas through fairy tales and parables. These books used to be a mix and match of playfulness, imagination, and magic tricks. For example I did a programme called System and Interaction, which was a complex subject by itself, but by taking a story of Jack and the Beanstalk, it became very easy for a child of eight to understand. This was the time when we were hobnobbing with scientists, product designers, architects, graphic artists, anthropologists. I must have been around twenty two years old and it was great in my formative development.

It came in the wake of an era in Indian cinema where everything had fallen into the dark ages – the VCR had entered people’s homes, television was(and is still) becoming increasingly lucrative, and producers from the South had imported their inane ostentatious approach to Mumbai. Was, your film, at a level, aware of this era; or did you plan it as an entrance into another newer one?

I was aware of all the happenings and wanted to make my film as a force that would have to be reckoned with by the new order. My effort was appreciated even by the commercial industry, the Filmfare being the validation of that claim. With Om Dar Ba Dar, it seems you are consistently attempting a departure from the aesthetic of the parallel cinema, and also its thematic concerns. It is almost as if your film is an expose of the hypocrisy of the other films produced by NFDC.

You set your film in a small town, but instead of demystifying and simplifying the residents of that town, you deliberately choose to enhance their mystery and present them as entangled in far greater issues than mere sociological concerns. As such, your characters are first human and then trigger points for greater issues, a complete antithesis of the films of someone like Shyam Benegal?

Those days we used to call this middle wave cinema “Complaint Box”. What more can I say?

Do you think the narrative is a burden that cinema has fallen in eternal servitude to? Is it like lyrics are to music? Considering, also, that your film uses the narrative only as an excuse to traverse greater ideas – some of which are Om’s identity crisis, the hypocrisy called Indian culture, Gayatri’s sexual deprivation, curiosity related to adolescence, and the move from adolescence to adulthood? In that sense, your film is almost anti-narration.

Usually I start constructing a screenplay by dreaming of images and shuffling them in my mind. Then I note them down on paper. Since I am very weak in thinking in languages, I work in a way which in the end takes a story form as a way to keep these images together. But surprisingly, I never read what I write. The screenplay is basically for the production break down. I keep processing the images in my mind till the last moment and not relying on the fixed image on paper.

You’ve written that cinema was essentially conceptualized through the incorporation of the concept of a cyclic loop, but as the medium progressed, the events within a story were reduced to a linear progression, with one thing happening at a time, and more importantly never happening again. Was your film a return to the idea of the ‘loop’; the ‘ellipse’?

This kind of a conceptualization I only developed after I was working on the Phalke project. During Om, I was not aware of it. But in Om, the images keep repeating in different shapes. And adhering to a musical system of returning again and again. And arriving at a ‘sam’.

You also deliberately dissociate sound with related imagery at various points in the film; for instance when Om’s father is indicted for conning people through fraudulent astrology, and you shoot him from a roof into the crowd and a voiceover announces the court’s judgement – was it done to make the audience consistently aware of the element of sound that they had taken for granted?

Since I couldn’t illustrate all the information that I wanted to give to the audience, I was making the best use of the filmic time available.

Om Dar Ba Dar is a film that exists in the form of mythic folklore in the annals of Indian cinema history. Most film lovers know about it; but most haven’t watched it. You have written that it’s a Dadaist film. Which would mean that you were fighting against an established order to you’re your ‘chaos’. What was that ‘established order’ for you? Even then, demystify it for us.

It is a fictional film set in Ajmer.

That done, tell us about your involvement with Salim Langde Pe Mat Ro.

I was doing research on that project and used to go to Bombay Central, Grant Road, interviewing small gangsters operating in various byelanes, composing a prototype of Salim, the protagonist.

Ever since Om Dar Ba Dar, you’ve made documentaries in association with the PSBT. Why do you think the documentary form has assumed a didactic status in the realm of Indian cinema, and why is no longer an exploration; but a lesson? What do you think is the reason behind its waning popularity.

There is a mix of kinds of achievements and intention in documentary today, just as in earlier times, during the Film Division times. But once in a while, we find very well realized short films and documentaries within this funding system.

For the last 20 years, you have been working on a documentary project tentatively entitled The Life and Times of Dadasaheb Phalke. With a current film, Harishchandra Factory, winning critical accolades, where do you think your effort stands in terms of its relevance?

With the coming of Harishchandra Factory, people have taken a renewed interest in my project. Personally I really don’t know what kind of a form, in the end, my project is going to take and the number and the kind of off shoots.

Why the fascination with Dadasaheb Phalke? A fascination which stretches into your exhaustive reading on him, and accumulation of different resources of information on him? So much so that you’ve had to scrape through and seek artist funds to maintain a normal lifestyle.

This was the only way to educate myself in all the arts and crafts. There are so many areas in this project which are beneficial to various funding agencies. So, it has becomes a never ending symbiotic relationship between me and others.463099_3004821194900_1101066903_o

You have also said, “As Brahma of the Pushkar is the father of the artisan, so is Phalke of Trimbak given the title of father of Indian cinema-my two obsessions.” – how important is this inquiry into the figure of a father for you?

There is a deeply ingrained image in my mind of the story of Brahma and his five heads, which is a generative image and excites my imagination. The story goes like this:

One day, Brahma, the father, the creator, was sitting by himself and he created a little girl from himself. The girl stood facing her father, the Brahma. She was happy in the beginning but suddenly got terrified, seeing the lust in her father’s eyes. So she moved to the side. Brahma did not turn his head, he just sprung another head on the side to look at her. She again turned and in this way, the four heads sprung from Brahma’s neck keeping a track of her terrestrially in all four directions. So she flew to escape his gaze. A fifth head sprung to scan her in the sky. An adolescent Shivgana(aspect of Shiva)- Batuk Bhairava- not understanding the basis of the play of nature between the creator and the creation, in rage, cut off the fifth head of Brahma. The head stuck to his hand and with that pain, he aged and turned into an old man himself. Something similar with Phalke that I want to arrive at…

You have talked in the past about cinema’s historical preference of the temporal montage over the spatial one – the latter being the one which facilitates an arrangement of shots that depict actions taking place not one after the other; but simultaneously, only in different spaces – do you think the cross-cutting techniques employed by Jean Pierre Melville, Edward Yang or Fred Zinnemann; or the narrative schema employed by Quentin Tarantino or Jean-Luc Godard were attempts at the presentation of simultaneously occurring events in different places?

There cannot be simultaneity because the audience will watch the cross cut events in a linear way, in time. The spatial montage can function in cinema like the way it does in Mughal miniatures, many actions, of different volumes, in the same space.

Expressionist cinema does this, often, where multiple images are aesthetically unfolding from the same horizon- different from the clumsier split screen.

Who were your formative influences while growing up? Which were your favourite films?

Andy Warhol, Bhupen Khakar. A lot of friends. Navjeet Singh, Rahul Dasgupta, Arun Khanna, Manohar Shyam Joshi. Roman Polanski. Ozu. Bunuel. Alan Resnais. My favorite films include- Tokyo Story, Life Upside Down, Days of Matthew, Intimate Lighting, Nazarin, and My American Uncle.

You have talked about the emergence of the new Indian cinema in the 70s being a result of realistically set literature that was the precedent of that cinema. How important do you think is the role of literature in shaping the aesthetic of cinema?

The text based cinema will have a different aesthetics and would depend on the source. Like My American Uncle is based on an essay by a biologist, or the Iranian films- Wind will Carry us or The Taste of Cherries is based on Camus’ essay from the Myth of Sisyphus. Or say, taking a text from a short story, novel or epic will lead to different kinds of cinema. If you like at Ray’s films, Bibhuti Bhushan takes him somewhere else and  ­Rabindranath Tagore takes him somewhere else. During 70’s when Mrinal and Ray were sourcing their films from the same kind of a text, say, Samresh Basu, Shankar, Sameer Ganguly, their films look alike, you cannot differentiate between Interview and Pratidwandi. At the same time, there is a different kind of cinema that does not depend on the literary text. And uses the liberties that cinematic imagination provides with, constructed shot after shot. You can see that kind of films in early Roman Polanski.

Where do you see the position of the truly independent and experimental filmmaker in the nation today?

Digital film making is the way.

Finally, do you believe the attainment of pure cinema is a dream possible today, or do you, like Peter Greenaway and Godard, believe that that possibility has long been exhausted; and that cinema can no longer rid itself of the influence of text? Can an image, thus, finally detach itself from a word?

If you take cinema as an activity, and an empathetic tool towards the consciousness around, I think it is possible

.Kamal swaroop

(Published In Indian Auteur: Jan 2010, issue no-8)

Om Dar Ba Dar – A Pioneer in Indian Avant – Garde : Riddhiman Basu

By Riddhiman Basu

“Forget Bunuel, Jodorowsky or Warhol for a while! If there’s a single Indian film that draws you towards mind-blowing realm of post modernist…absurdist…surrealist blast to the senses, here’s the cult made by Kamal Swaroop.” This had been the reaction of one of my facebook friends(Hiren Dave), after watching ‘Om Dar Ba Dar’. This is considered to be a groundbreaking film in Indian cinema, pertaining to the avant-garde genre.

The term avant-garde film refers to the genre of innovative and experimental cinema. Avant-garde as a film movement started in Europe in the early 20’s notably among filmmakers like Rene Clair, Man Ray, Duchamp etc. In 1929 film auteur Luis Bunuel in collaboration with artist Salvador Dali created a short film ‘Un Chien Andalou’, that would become a benchmark for avant-garde films all over the world. The genre gradually spread to other parts of the world and resulted in various flavors of experimental filming. This was possible because avant-garde did not restrain itself to any particular format, rather opened up a boundless arena for experimentation on celluloid.

India did not lag far behind. Though avant-garde did not emerge as a major movement during the Indian New Wave, there have been attempts at experimental cinema since 1969(Uday Shankar’s ‘Kalpana’(1848) did contain elements of avant-garde, however, it is debatable whether it could be called a full fledged avant-garde film). However the first feature length film that could be classified as avant-garde (though not necessarily synchronous with the avant-garde movement) came in 1988 from the hands of an auteur known as Kamal Swaroop. ‘Om Dar Ba Dar’, was also the first avant-garde film to get national and international recognition and is still widely viewed and discussed among film enthusiasts.

Kamal Swaroop, a 1974 graduate from FTII Pune had previously worked on a collaboration project, ‘Ghasiram Kotwal’(1976) with the likes of Mani Kaul and also assisted Richard Attenborough during filming of ‘Gandhi’(1982). ‘Om Dar Ba Dar’ was his first solo film. Its release was preceded by a huge controversy in the censor board. However, it won Filmfare Critics Award for the Best Film in 1989. Today, after 20 years of its release, this film has attained a cult status.Preview

The film is a satirical representation of Indian life as a whole. However, this statement fails to give any insight into the film that is absurdist to the core. It eludes conventional narrative structure in general and comprises of a series of psychedelic and non-linear imagery that does not attempt to make sense on a whole. It rather comes across as a deconstruction of collective meaning.

At this point, I would try to give a brief overview of what distantly resembles a plot for the film. Om(Manish Gupta/Aditya Lakhiya) lives in Ajmer. His father Veer Shankar(Lakshminarayan Shastri), who is referred throughout the film as Babuji, is a retired government employee cum astrologer. After Om was born, Babuji discovered that he was destined to die at the age of 18 years, from his horoscope. He named the newborn child Om in an attempt to evade the agents of death, since he believed that the sound of ‘Om’ has never been heard in the jamalok. Om’s elder sister Gayatri(Gopi Desai) considers herself equal in stature to men and sits in men’s section of theatre to emphasize this. Jagdish(Lalit Tiwari), a young man shifts to Ajmer from Jhumritalaiya. He falls for Gayatri when he spots her bold demeanor in the cinema hall. He is further elated to discover that he and Gayatri have been requesting the same song on radio for years. Om meanwhile gains popularity in school due to his ability to hold breath underwater for a long time. Babuji buys Gayatri a bicycle. Jagdish takes the task of teaching her how to ride it. They come closer. Om celebrates a friend’s birthday at a terrace on the same night that Neil Armstrong and his crew land on the moon.

As days pass, we see Babuji setting up an astrology centre in his home and Jagdish becoming his typist. Gayatri also helps Babuji in receiving clients and carrying out the business.

Om has grown into a teenager. He is interested in science as well as mystics and occult and has a fascination for frogs. A lady named Phoolkumari(Anita Kanwar) arrives to consult Babuji. Since she is unable to pay them money, Babuji and Gayatri decide to appoint her as a typist, citing that Jagdish’s spelling is bad. This enrages Jagdish and he breaks off contact with them.

Om is in an adolescent phase and is attracted to Phoolkumari. Lala Lotamal, a businessman on fearing an approaching war; hides his diamonds in the soles of a pair of his shoes and gives it to Babuji for safekeeping.

Meanwhile, Jagdish visits Gayatri. She compels him to get involved physically with her. One day, Om runs off wearing the shoes with diamonds, unknowingly. Babuji suspects Phool and she puts a curse on him which would make him unable to leave his room forever. Om arrives at Lotamal’s private land where some of the diamonds fall off and are swallowed by frogs. When Lala Lotamal comes to claim the diamonds, Babuji convinces him that he has crushed the diamonds and mixed it in the food he is being served. He also instructs Lalaji to hold his bowels for fifteen days and defecate in his land on the night of full moon in order to sow an unlimited supply of diamonds. He also warns him that if anyone sees him in the process, that person should not see anyone else till morning. Lalaji goes to his own land on full moon night in order to comply. Om spots him in the act. Lalaji remembers Babuji’s advice and appoints Om as the guardian of his land. Om starts supplying frogs to a local girls’ school for biology practical lessons.

When these frogs are dissected in the Biology class, the girls discover diamonds in them. The word spreads and leads to a frog-hunt on Lalaji’s land by a mob, in search of diamonds. Though the diamonds have actually fallen off from Om’s shoes, Lalaji believes that they have come from his feces. Lalaji tries to stop this and is shot.

When Om returns home, Babuji tries to catch him. In the process he crosses the verandah and dies due to Phool’s curse. Om arrives at Pushkar. A local Brahmin discovers his ability to hold breath underwater and plans to utilize it for moneymaking. Since the time of Pushkar festival is approaching, he convinces Om to do his breath holding trick every night at 12. This brings a mass of pilgrims to the lake every night. The media also get interested in this event and various brands use Om to promote their products. The people are inspired by Om’s feats and decide to hold their breath along with him as a movement. Om’s discussion with his friend leads him to believe that since his nature is to hold breath, he should breathe once in order to participate in the peoples’ movement(A Saans a ra andolan). He dies underwater when he tries to breathe and his dead body floats up.

Jagdish comes to visit Gayatri after a long time and finds that she has given birth to a child(presumably a result of their lovemaking). He pleads for forgiveness and Gayatri finally obliges. In the end they contemplate suicide by taking potassium cyanide(KCN) and plan to let the world know about its taste. Jagdish takes it first and instructs Gayatri to take down the taste of KCN, since he is weak at spelling. He utters “Gobar”(implying that KCN tastes like cow dung)  before dying. Gayatri changes her mind, abandons the suicide plan and returns home in a bike.

Though the above summary seems logical and linear, the actual treatment is far from it. Many parts of the plot come in reverse and juxtaposed sequences with respect to time. For instance the event of Om arriving at Pushkar is shown before he meets Lotamal in his land. Also the sequence of Lalaji coming to console Gayatri after his father’s death is shown after the sequence of him being shot dead during the frog-hunt. However, such non-linearity is perhaps the least of befuddling elements in the movie.

As mentioned before, the film does not have a collective meaning, a fact that aligns it with the principles of absurdism (human beings’ inability to comprehend an absolute meaning in the universe). However, characteristics or symbolisms can be discerned if we look at the movie in parts. Indeed, the film contains a myriad of varying themes and traits referenced at multiple junctures in the narrative/anti-narrative.

My attempt would be to enumerate some such key elements of this unique film:

  • Examples of non sequitur logic(e.g: all a’s are b’s) are strewn throughout the movie. One example that comes to my mind is towards the beginning, when Gayatri asks Om, “Tujhe kaise pata barish hone wali hai ?”(How do you know it is going to rain?) and Om replies “Tu Kangi jo kar rahi hai”(Because you are combing your hair. Many of the dialogs in the film follow this pattern. Besides this, many of the dialogs are deliberately incoherent and incongruous to produce a nonsensical effect.
  • Another central theme of the movie is the effortless intertwining of science, religion and superstition in Indian life. When Gayatri asks, “Kya koi ladki ladke ke bina Everest chad sakti hai?”(Can any woman climb the Everest without the help of a man?); Jagdish replies, “Parvati ji Chadi Thi”(Godess Parvati did). Again when Gayatri says, “Suna hai chand pe nani ka post khali hai”(I’ve heard that the post of the old lady on moon is vacant), Jagdish in turn asks, “Tum kat leti ho?”(Can you sew?) . The chand ki nani is referenced again on the day when man lands on the moon. Amidst the celebration on the terrace, we see a woman with white hair smiling just when the time of the moon landing arrives.These aspects may seem to be abstract amalgamations, however if we think how science, religion and superstition serve as driving factors for an average Indian citizen, this treatment assumes a very significant relevance.
  •  Gayatri’s part in the movie is perhaps the only linear aspect in the whole film and integrity can be found between the fragments of the narrative relating to her. This is perhaps because views on women’s liberation come through her. She considers herself equal to men and sits in the men’s section of movie theaters, rides a bicycle etc to prove it. In one sequence, she asks Jagdish to make love to her. When Jagdish fumbles with the strings of his underwear, it is Gayatri who brings the scissors and cuts the string. Their lovemaking in portrayed through a humorous metaphor. We see Babuji calling out Gayatri’s name and cycling to and fro in front of their house. Here Babuji is physically not present, rather is a symbolism for the patriarchal inhibition, seemingly for protecting a woman’s virtue before marriage. Babuji collapsing with the cycle signifies the event of Gayatri’s capsizing this inhibition.
  • The scenario of a woman asking for sex rather than succumbing to a man’s desire was seldom seen in the cinema of that time. This is one of the aspects among others, which illustrates that Kamal Swaroop’s masterpiece was much ahead of its times. The director has maintained an egalitarian outlook throughout the movie. Thus, Gayatri gives birth to a child without marriage and raises her alone. Towards the end Jagdish takes Gayatri along to the edge of a cliff in the attempt to commit suicide by tasting KCN. He mentions about udhna or flying together. However, we witness, only Jagdish taking KCN and dying. Gayatri changes her mind and returns on a scooter, as a strong departure from Bollywood love stories depicting the hero and heroine dying together. Here the flying becomes a double ended metaphor, one for suicide and the other for Gayatri’s liberation.
  • The sequences involving Om comprise of the most bizarre and abstract imagery in the whole film, be it the dream sequence hinting at his fear of examination (biology), or the ‘Rana Tigrina‘ song. Om’s fetish with frogs is evident from the sequence of this song ending with Om supposedly gripping the picture of an attractive woman and the sequence where a dead frog is referred to as ‘ladki ki laash’(Corpse of a lady). This could be a subtle hint towards zoophile tendencies. Om’s comment about his growing nose obstructing his view(“Jab bhi mai padta hun, naak akshar kha jaate hai”) and the fact of his nose bleeding, is an indicator of the fact that Om has grown up, reached an adolescent age. Phoolkumari puts her black glasses on his eyes, which she claims would enable him to read properly.

These simplistic scenarios in my opinion represent Om’s adolescent craving and the sexual undercurrents between Phool and Om. Interestingly, these are not represented through Freudian symbolisms, which is generally a favorite of filmmakers. The director rather conjures up an assemblage of unique metaphors for this and many other instances in the movie.

  • The Pushkar lake, that plays a significant part in the movie is a place of immense religious importance for the Hindus. In the texts of Padmapurana, it has been described as the place where Brahma had once held a jagna. Consequently this is the only place to have a temple dedicated to Lord Brahma. It is believed that people who take a dip in the Pushkar during the time of Karthik Shukra Paksha(Full Moon), supposed to be the time of the year corresponding with Brahma’s jagna, wash away their sins and open the gates of heaven in their afterlives. The opening of the Pushkar festival is declared through the statement “Swarg dharti par utar chuka hai”(The heavens have descended to earth) delivered in an airlines announcement-like tone. It is during this time that Om’s magical feat in the Pushkar is put up as a moneymaking prospect for the local Brahmin. The reference of the ‘Promise’ toothpaste(a brand which was available back then) stresses the use of religious platforms for advertising. The use of God as a brand is equally relevant in our times.
  •  Songs have been an integral part of any Indian movie, since inception. The avant-garde songs of ‘Om Dar Ba Dar’ play a very important part in this avant-garde movie as well. The song played on radio is an attempt towards nonsense verse. The song ‘Meri Jaan AAA’ is partly in English, illustrating the English speaking tendencies of the youth and is  a reflection of urban men’s outlook toward women in the then India. ‘Rana Tigrina’ depicts the adolescence of Om and his fascination with frogs.  The lyrics by Kuku and the music by Rajat Dholakia are very appropriate.

One could go on an on writing about this movie; there is so much to write and so much yet to discover. Every time I watch this movie, I find an unexplored nook, a new aspect which I had previously overlooked. Even after all these years, Kamalji gets emails, messages and posts in facebook(he is active in facebook, by the way) from fans of this movie and he is very earnest in replying back to them and discussing about his movie. I was fortunate to have interacted with him on facebook and resolved various doubts about ‘Om Dar Ba Dar’. There are a considerable number of people, who want this movie to be remastered and released with English subtitles. However, when I mentioned this to Kamalji, his reply was, “Too late. I am too tired by this film. I like to move on.” However, the ardent lovers of the film will keep on expecting.

We have had very few examples of feature length avant-garde films in the arena of world cinema. The prominent ones among them were made mostly by Alejandro Jodorowsky. Even considering those, ‘Om Dar Ba Dar’ is unique and Indian to the core. Kamalji does not like to call it an avant-garde film however. In his opinion, “Avant-garde is a technical term applied to a different movement. In Om Dar Ba Dar, I was reacting to the parallel cinema of that time.” He acknowledges Surrealist and Dadaist influences in it. It is certain that if someday, an Indian film theory is developed; this cult classic will receive a special mention as a pioneer in Indian avant-garde, a very deserving accolade for this film and for its creator.

Riddhiman Basu is a Senior Software Engineer at Accenture. He lives in Calcutta.

Courtesy madaboutmoviez

Gangs of Wasseypur: This world is alien for many who do not know their own Wasseypur

BY Ravish K. Chaudhary

           

Anurag’s “Gangs of Wasseypur” is a rapture, rapture in our narrative of Gangsters. It does not narrate a tale of two giants in conflict with each other. It tells us the blood soaked story of a society that exists (within our own cities/towns) in accordance with its own rules. It captures the very logic of the world that runs parallel, however uncovered within the official history and sociology of our society. The world that silently appears in our public sphere mutely interacts with our everydayness, silently but firmly assert its presence and dissolves in what appears mundane. The existentiality of its habitants doesn’t lie in its locality but in the psyche that stretches from Sultana Daku to faizal Khan. Narrated in the background of murky coal business, sprawling from British era to early nineties, the story tells us the saga of at least three generations for whom life is defined by nothing but befuddling lasciviousness accosted by Vengeance.  The Sprawling Picaresque curated with series of discrete frames captures the existentiality of a referential world where the civil life of metropolis, laden with fictions of democratic and humane values, is as imaginary as the giggly soap of “Saas bhi Kabhi Bahu…” kind.

GWP is a trip to our innerness, a journey to some corner of our own cities, to a world that exists where most of us have grown up, are living and shall die. This is not a journey to a garrison where all influential Mafia’s sitting in safe heavens decides the fate of others. Wasseypur has a different logic, live-kill-live. Blood is in the phenomena in Wassypur and automatic (gun) is inspiration. The generations of sultana daku and Sahid khan are in consistent conflict with each other to snatch a little  wheat, coal, sand, scrap, fish (immaterial what the goods is) lying at the margins of “the Big” Imperial British, its successors TATA, BRILA, Thapars and the new satrap of this black heritage Ramadhir Singh. The inhabitants of wasseypur are not Dons, they do not have militia, they have their kith and kin that are revered by common glories and are inflicted by common inspiration of retribution. The Pathans, The Qureshies in the nineties are not killing each much for resources lying beneath and in around wasseypur, but for the sake of the imagined dominance that traditionally Qureshies have inherited and the Pathans lacked. Though the story is presented as the revenge saga of Sardar khan against Ramadhir Singh (this is the training we have to understand a hindi movie), Anurag’s narration goes beyond. Each frame in the movie reveals an aspect of the society that has only two operate variables: Blood and Flesh. Sardar Khan, and so many others, through his life oscillate between these two instincts. In Wasseypur, Anurag depicts, instincts are rules. The justification of these rules appears from imagined narrative of dominance that Qureshies and Pathans share in a hierarchical manner. At the confluence of these two instincts, so many wasseypurs in so many of our towns/cities exists. At the confluence of these two instincts, natives of wasseypur, eat, drink, work, love, marry, give birth and kill. Anurag’s GOW is a narration of the intertwined instincts that gives the society called wasseypur an existence that is alean to the imagination of ‘Shining’ or “Incredible” Indians. It asserts a Beingness to its natives distinct from what the suave citizen of metropolis of post-liberalisation inheres.

The saga drenched in blood and written on the canvas of coal is a departure from our traditional understanding of violence as an individualistic phenomenon in hindi movies. Individualistic violence is replaced here by the psyche that a society in its totality carries. GOW leads us to a condition where Sardar Khan, ramadhir Singh, the Qureshies, the pathans, coal, sand, fish and all that remains faints in the background. What persists is a penetrating lustful glance of hunters searching for Blood and Flesh. And that’s the rule of life in so many Wasseypurs.

Note: One must add, this world is alien for many who do not know their own Wasseypur.

(Posters’s courtesy- Gangs Of Wasseypur: Fan Posters)


Ravish is an engineering graduate and master in Sanskrith from  JNU. He briefly pursued philosophy at JNU, and is  now an engineering personnel with the ONGC, Mehasana. He has also been involved in the cultural politics.

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